हारी हुई पार्टी की तरह बिहार में हारी भाजपा

09 नवम्बर 2015   |  गिरिजा नन्द झा   (157 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरिजा नंद झा

बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की कसौटी नहीं है। यह परिणाम इस बात का भी प्रमाण नहीं है कि मतदाताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के विकास के  विज़न को नकार दिया। यह इस बात की भी पुष्टि नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह में जीत को सुनिश्चित करने की ‘काबिलियत’ नहीं है। यह इस बात को भी साबित नहीं करता है कि प्रधानमंत्री मोदी और अध्यक्ष शाह की जोड़ी फ्लाॅप हो गई है। बिहार विधानसभा का चुनाव महागठबंधन बनाम एनडीए के बीच का चुनाव था और बिहार के लोगों को चूंकि ‘जंगलराज’ से बाहर निकलने की जल्दबाजी नहीं है, और इसीलिए यह एनडीए के खिलाफ मतदान मात्र है। इसका भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है। 


बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीतिक सूझबूझ का कचड़ा कर दिया। रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी ने सत्तर प्रतिशत बेड़ा गर्क कर दिया और तीस प्रतिशत का काम मुलायम सिंह यादव ने तमाम कर दिया। पासवान और मांझी अपना भला तो कर नहीं पाए, भाजपा का कहां से कर पाते? रही बात मुलायम सिंह की तो उन्होंने तो अपने उम्मीदवारों के नाम तय कर बिहार को जो बाय-बाय बोला उसके बाद तो पीछे पलट कर भी नहीं देखा। हिसाब किताब इस तरह से बिठाया गया था कि लालू प्रसाद यादव की यादवों को मुलायम सिंह आधा कर देंगे और दलितोें को पासवान और मांझी अपने साथ ले आएंगे। सवर्णों के वोट बैंक पर भाजपा स्वाभाविक तौर पर अपना अधिकार मानती है और जो थोड़ी बहुत सीटें उसे मिली भी है, वह उन्हीं की बदौलत मिली है। नतीजों का अंकगणित इतने पुख्ते तरीके से तैयार किया गया था कि गड़बड़ी की कहीं कोई गुंजाईश ही नहीं छोड़ी गई थी। अंकगणित में कोई गड़बड़ी नहीं थी, मगर, बिहार के मतदाताओं के मिज़ाज को जांचने परखने वाले को भी अध्यक्ष शाह साथ कर लेते तो शायद, मामला इतना उलटा नहीं पड़ता। 


बिहार विधानसभा चुनाव के इस परिणाम ने बिहार में विकास की गति पर विराम लगा दिया है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साफ कर चुके हैं कि बिहार के विकास के लिए 1 लाख 65 करोड़ रुपये, जो उन्होंने जमा कर रखे थे जिसे वे किसी ‘योग्य व्यक्ति’ के हाथ में सौंपना चाहते थे, वे इसे वापस ले जा रहे हैं। अब जबकि लोगों ने अपना फैसला सुना दिया है कि उनका भविष्य ‘जंगलराज-2’ में ही सुरक्षित है तो फिर मेरे सहयोग और समर्थन की जरूरत रही कहां? बिहार, फिलहाल विकास के बारे में सोचना छोड़े, बल्कि नीतिश-लालू के गठबंधन की सरकार में अपनी जान बचाने का इंतज़ाम खुद करे। प्रधानमंत्री मोदी अपने धुन के पक्के हैं और दिल्ली इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां पर होने को आम आदमी पार्टी की सरकार है मगर, सफाईकर्मियों के बारे तक में भी फैसला लेने के लिए यह सरकार स्वतंत्र नहीं है। 


बाद में जो होगा, देखा जाएगा। फिलहाल, बिहार ने भाजपा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद बिहार के मतदाताओं ने जिस तरह से भाजपा को नकार दिया है, उसके संकेतों को समझना जरूरी है। संकेत यह है कि चुनाव ना तो नारों से जीते जा सकते हैं और ना ही वायदों से। फूट डाल कर तो कतई नहीं। यह बात इसलिए भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार विधानसभा का चुनाव भाजपा जीती हुई थी मगर, उसकी नीतियों, रणनीतियों और अति आत्मविश्वास ने पार्टी की जीत को हार में बदल दिया। नीतिश कुमार का लालू प्रसाद यादव के साथ चुनाव लड़ने के फैसले को बिहार के मतदाता पचा नहीं पा रहे थे और उस वज़ह से वोटों का जो बंटवारा होना था, वह सीधे भाजपा की झोली में आनी चाहिए थी, मगर, आखिरी वक़्त में बाजी पलट गई। 


दरअसल, पार्टी अध्यक्ष शाह के अति आत्मविश्वास ने भाजपा को कहीं का नहीं छोड़ा। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पार्टी को 72 सीटें क्या मिली, शाह का आत्मविश्वास जो सातवें आसमान पर पहुंचा, वह दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूरी तरह निपट जाने के बाद भी कमजोर नहीं पड़ा। प्रधानमंत्री मोदी का उन पर अटूट विश्वास बना रहा और अध्यक्ष शाह वही करते रहे तो उन्हें ठीक लगता रहा। बिहार के इतिहास और भूगोल को जानने के लिए स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की समझ पर भरोसा करने से उन्होंने इंकार कर दिया। पार्टी नेताओं की पार्टी में हैसियत देख कर कार्यकर्ता क्षुब्ध हुए और वेे बेमन से पार्टी दफ्तर और रैली स्थलों का चक्कर लगाते रहे। 

अगला लेख: चुनावी नतीजों के बहाने राजनीति का अंकशास्त्र



बहुत-बहुत धन्यवाद.

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