तितलियाँ

10 नवम्बर 2015   |  शब्दनगरी संगठन   (327 बार पढ़ा जा चुका है)

तितलियाँ

कभी

बचपन में

तितलियाँ पकड़ते थे,

फिर उँगलियों में छपी 

उनकी सुनहरी-रुपहली

काया देखा करते थे 

बहुत देर तक ।

वो तितलियाँ अब

तब्दील हो गई हैं

चमकते खनकते

सिक्कों में ।

इनके पीछे भी 

हम भागते फिरते हैं

वैसे ही; पर अब

इन्हें छूकर-गिनकर

हाथों को धो लेते हैं...

 

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