चुनावी नतीजों के बहाने राजनीति का अंकशास्त्र

10 नवम्बर 2015   |  गिरिजा नन्द झा   (169 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरिजा नंद झा

एक बात नोट कर लीजिए। लोगों की सोच एक दिन में नहीं बदलती। अब लोग दिन, महीने और साल का बही खाता साथ में रखते हैं। कौन क्या कर रहा है और किसे क्या करना चाहिए-इसकी पूरी जानकारी लोगों को है। ऐसे में यह कह देने से कि पिछले हिसाब किताब में गड़बड़ है और मेरा हिसाब किताब पाक-साफ है, बात खत्म नहीं हो जाती है। नीतिश कुमार ने बिहार में क्या किया है, वह वहां के लोगों को पता है, इसे बताने की जरूरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं होनी चाहिए थी। हां, प्रधानमंत्री मोदी ने सवा साल में क्या किया है, यह अगर बिहार के मतदाता को बताते तो कुछ फायदा जरूर होता। 


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तो बस इतना ही कहा था कि आरक्षण की जो व्यवस्था सदियों पुरानी है, उसे समसामयिक नजरिये से देखे जाने की जरूरत है। शायद, इसमें कुछ गलत भी नहीं है मगर, गलती तब हुई जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने लोगों को यह समझाने में पूरी ऊर्जा ख़त्म कर डाली कि भाजपा आरक्षण के खिलाफ नहीं है। इस तरह की सफाई की जरूरत क्यों पड़ी? नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, तभी उन्होंने कहा था कि समूल व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है और इसके लिए कुछ ‘तकलीफदेह’ फैसले लेने होंगे और इस पर किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। उस दिन से ले कर आज तक कड़वी दवाईयां वे लोगों को पिला रहे हैं और कड़वी दवाओं को पीने की तकलीफों को लोग उसी तरह से झेल रहे हैं। सारी तकलीफें, लोगों को आर्थिक सुधार के नाम पर पहुंचाई जा रही है। इस सबके बीच, कमाल की बात यह है कि सुधार का नामोनिशान तक सतह पर नहीं है। बहुत सारे लोग जो जिन्होंने जीडीपी का नाम भी पहली बार सुना है, वे भी उन तथ्यों का हवाला दे कर बताते हैं कि देखिए देश कितना आगे निकल गया। 


रक्षा मामले, विदेश मामले, जीडीपी और सकल घरेलू उत्पाद जैसे शब्द आम आदमी को समझ कहां आते हैं? जो थोड़ी बहुत समझ लोगों को आती है, वह यह कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत घट कर सतह पर पहुंच गई है तब भी देसी बाजार में वह महंगी क्यों है? जब किसान अपनी जान दे दे कर चावल दाल उपजा रहे हैं तब भी भोजन-भात से दाल क्यों गायब हो रही है? नमक से ले कर चीनी तक और खाना पकाने के लिए तेल तक की कीमत आसमान को क्यों छूती जा रही है? चुनाव लड़ते समय, कालाबाजारियों से हजारों टन दाल बाहर निकाला जा सकता है तो चुनाव के बाद क्यों नहीं? जहां पर लोगों की जिंदगी दाल-भात में उलझी हुई है वहां पर वे खुद से अलग हट कर सोचे भी तो कैसे और क्यों सोचे? क्या बाजारवाद को ले कर उदारवाद का यही सिद्धांत है कि लोग भूखे मर जाएं और बाजार फलता-फूलता रहे। 


सरकार लोगों के लिए हो, लोगों के बारे में सोचे तो फिर वैकल्पिक सरकार के बारे में कोई क्यों विचार करे। मगर, लोगों को करना पड़ता है। यह बात अपनी जगह दुरुस्त है कि दिल्ली में भाजपा के बजाय आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद भी लोग राहत महसूस नहीं कर पा रहे हैं। बिहार में भी लालू प्रसाद यादव के साथ नीतिश कुमार को राजपाट सौंपने का मंशा वहां के लोगों को नहीं था, मगर जब लोग गुस्से में होते हैं तो सबसे पहले वे अपने ही फैसले को पलटने का काम करते हैं। 


जो लोग यह मान कर चलते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा का ‘सत्यानाश’ आरक्षण ने किया, वे वह लोग हैं जो आज भी देश को सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर जाति और धर्म से ऊपर उठा हुआ नहीं मानते या इससे बाहर झांकने के लिए तैयार नहीं हैं। लालू प्रसाद यादव ने बिहार में यादवों और मुसलमानों के समर्थन से 15 साल तक राज किया। फिर, वह भी उनसे छिटक गए। 2005 में जब पहली बार नीतिश कुमार पूर्णकालिक बिहार के मुख्यमंत्री बने तो लालू प्रयाद यादव के यादवों और मुसलमानों का उन्हें समर्थन मिला हुआ था। दूसरी बार भी, उनके कामों को सराहते हुए यादवों और मुसलमानों ने उन्हें अपना नेता चुना। क्यों? बहुत आसान सा जवाब है। हिंदू हों या फिर मुसलमान, कुर्मी हों या कुशवाहा, पासवान हों या फिर दलित या महादलित-विकास का फायदा हर किसी को मिलता है। लालू प्रसाद ने तो जाति और धर्मों के आधार पर जीत हासिल की है-यह तथ्य अपनी जगह दुरुस्त बात है। मगर, नीतिश कुमार को लोगों ने क्यों वोट दिया है-यह जानना भी जरूरी है। और अगर इसकी तह में जाने से आप मना करते हैं, तो आप खुद को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं।

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शर्मा जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.

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