लघुकथा- बात बनी की नहीं , भाषा

09 दिसम्बर 2015   |  ओमप्रकाश क्षत्रिय '' प्रकाश -   (137 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा- बात बनी की नहीं ,  भाषा

लघुकथा – बात बनी की नहीं 

रघुवीर के चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी, “ बात बनी की नहीं ?”

“ अम्माजी ! भैयाजी गए है. मामला टेढ़ा है. पहले उस लावारिस को पटाना फिर डॉक्टर को राजी करना, उस के बाद उस का ओपरेशन होगा. तब जा कर यह मामला फिट होगा. इस बीच किसी को मालूम भी न हो. यह जरुरी है. अन्यथा अस्पताल वाले और हम सब मुसीबत में फंस जाएँगे.”

“ और हाँ. तुम्हारे बाबूजी को पता न चले की एक लावारिस का. अन्यथा वे हार्टअटेक से ही मर जाएंगे.”

“ जी . इसी लिए तो. अन्यथा बाबूजी बिना बोले चले गए तो उन के द्वारा छुपा कर रखे गए लाखों रूपए भी चले जाएंगे.”

“ हाँ अम्मां, मैं  अभी पता करता हूँ.” कहते हुए उस ने मोबाइल उठा लिया, “ भैया जी ! उस का गुर्दा निकलवा  लिया क्या ? कुछ तो बता दीजिए की बात बनी है कि नहीं ? जी.” कहते ही रघुवीर का मुंह लटक गया.

“ अम्माजी अभी तक बात नहीं बनी है. जब बात बन जाएगी तो भैया फोन कर देंगे.” कहते हुए वह चिंतातुर अस्पताल में टहलने लगा.

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 ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"



आपकी रचना में सदा ही समाज पर कटाक्ष होता है सर।

आदरणीय प्रियंका शर्मा जी आप की मुश्किल का समाधान कर दिया गया है. कृपया प्रतिक्रिया दीजिएगा.

प्रियंका शर्मा
11 दिसम्बर 2015

चित्र मे पढ्न थोड़ा सा मुश्किल हो रहा है ।

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