जाती बहार में

10 दिसम्बर 2015   |  aradhana   (198 बार पढ़ा जा चुका है)

मौसम के रंग -राग गए जाती बहार में

फूलों के लब से हास गए जाती बहार में


गुम हो गए सभी जैसे सर्द रात के में

ठंडक बनी रही दिलों में जाती बहार में


सोए हुए थे पेड़ सभी जगाने के बाद

जैसे कफस में सो गए कही जाती बहार में


उम्मीद अपनी अपनी थी सर्दी के देश में

कैसे कहे कौन रो कर ना उठे जाती बहार  में


नादाँ है कुछ ना बोलिए मौसम नहीं सही

"अरु" कातिल है अजब साथ जाती बहार में


आराधना राय "अरु"

अगला लेख: आसमान



aradhana
12 मार्च 2016

शुक्रिया प्रियंका जी

प्रियंका शर्मा
11 दिसम्बर 2015

बहुत दिनो बाद , एक बार फिर अरु की कविता छा गई ।

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