उन्नति की ठाना कर

28 जनवरी 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (185 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेरक गीत -उन्नति की ठाना कर
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उन्नति की ठाना कर ,खुद को भी तू जाना कर |
खुद्दारी से जीना है तो , प्रेम का रस पीना है तो ,
अपनी हार न माना कर |
उन्नति की ठाना कर |खुद को भी तू जाना कर ||
सृजन करना तू हटकर,मेहनत करना तू डटकर |
कष्टों के संग तू रह कर,जीना चमनों सा खिल कर ||
जनता में तू जोश जगा ,जरुरत पड़े तो रोष जगा |
ईमान की नयी रीत बना,अपनी हार को जीत बना ||
जिन्दगी बहुत ही फानी है,तू नहीं यह बहाना कर |
उन्नति की ठाना कर ,खुद को भी तू जाना कर ||
धारा के संग तू बहकर , नयी बात नहीं कह कर |
घिसीपिटी जिन्दगी जी कर,मरना नहीं आँसूं पी कर||
ईमान की तू अलख जगा ,भ्रष्टाचार का भूत भगा |
खोज की तू लगन लगा ,उत्कर्ष की तू उमंग जगा ||
संतों की यह बानी है ,उनकी बात भी माना कर |
उन्नति की ठाना कर ,खुद को भी तू जाना कर ||
ये जो मित्रों शोहरत है ,यह तो नेकी की छत है |
संघर्षों से मिलती है ,प्रयासों पर पलती है ||
पाना इसे लियाकत से ,बचा इसे निज ताकत से |
तू है अगर सही पथ पर,तो चिन्ता नहीं कर गत पर ||
या तो तू अर्पित हो जा ,या सबको तू अर्पित कर |
उन्नति की ठाना कर ,खुद को भी तू जाना कर ||
खुद्दारी से जीना है तो ,प्रेम का रस पीना है तो ,
अपनी हार न माना कर |
उन्नति की ठाना कर |खुद को भी तू जाना कर ||
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