सपनों में आ जाना तुम

29 जनवरी 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (183 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@ सपनों में आ जाना तुम @@@@@
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"नाज"पर हो नाज मुझको ,ऐसा साज बजाना तुम |
तुम आज यह क्या जानो ,कितना बड़ा खजाना तुम ||
जब जरुरत पड़े मुझको तो ,सपनों में आ जाना तुम |
बस कर के मेरे दिल में ,नहीं लौट के जाना तुम ||
मेरे साथ मीठे सुर में , गीत प्रेम के गाना तुम |
नहीं रूठना कभी भी मुझसे,न देना मुझको ताना तुम ||
धीरज रखना तुम हमेशा ,नहीं कभी घबराना तुम |
कट जाएगें कष्ट तुम्हारे ,ये बात दिल में लाना तुम ||
मेरे मन -मंदिर की देवी ,हर महफ़िल में आना तुम |
काव्य-पाठ के हर मौके पर,सम्मान हमेशा पाना तुम ||
सुर -सरिता की पावन गंगा ,घर -घर में बहाना तुम |
ज्ञान का प्रकाश फैला कर ,नयी चेतना लाना तुम ||
अपनी काव्य -प्रतिभा से , कर देना दीवाना तुम |
सितारा बन कर सारे जग का,दुनिया में छा जाना तुम ||
ईमान की मिसाल बन कर ,जनता को जगाना तुम |
मेरी प्रेम -पुकार सुनकर , मुझसे प्रेम जताना तुम ||
समता की पहचान बन कर, भेद-भाव भगाना तुम|
नारी-शक्ति को प्रेरित कर, नया जोश जगाना तुम ||
मेरे दिल से जाने का , करना नहीं बहाना तुम |
जब जरुरत पड़े मुझको तो ,सपनों में आ जाना तुम ||
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