मन

29 जनवरी 2015   |  अपराजिता सिंह   (445 बार पढ़ा जा चुका है)

मन

​का हो तो अच्छा और न हो तो और भी अच्छा? क्या यह सुन कर दिल में हज़ारों सवाल नहीं आते.


आखिर मन की बात पूरा होना कौन नहीं चाहता . जब मन की कोई बात पूरी होती है तोह हम आन्नदित होते है प्रसन्नचित होते हैं.


लेकिन जब मन का न हो तब भी क्या हमें ऐसा अनुभव होता है. नहीं कदापि नहीं. तब यह क्यों की मन का न हो तोह और भी अच्छा.


सारांश यह है की जब मन की बात न हो तब हमें चाहिए की जो बात पर नहीं हुई उसके लिए हम ज्यादा मेहनत करें. अर्थात नयी उमंग और नयी उम्मीद के साथ जूट जाएं अपने काम पर .कितनी बार होता यह है की इंसान को अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अहसास नहीं होता . लेकिन जब कुछ हमारे मनोनुकूल नहीं होता तोह हम चिंतन मनन करें की आखिर गलती हुई कहाँ पर.फिर देखिये कैसे हम जब दुगनी मेहनत करते हैं तो कोई बात पूरी नहीं होती बस जरुरत है की हम थक कर बैठ न जाएं. बस अपने काम में लगे रहे और जुटे रहे.


किसी ने ठीक कहा है ---------


कौन कहता है की आस्मां में सुराख़ हो नहीं सकता


एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों


















के एल आर्य
12 फरवरी 2015

बहुत खूब मैडम, आपके इस लेख से कई महिलाओं व पुरुषों को प्रोत्साहन मिलेगा। धन्यवाद।

sahi kaha aprajita ji man kee bat hi aisee hai .

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