बो विश्वगुरु भारत देश कठे

31 जनवरी 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (246 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@ बो विश्वगुरु भारत देश कठे @@@@@
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मानवता है धर्म जकारो ,बे मिनख भलेरा आज कठे |
भ्रष्टाचार ने रोक सके , इसो भलेरो राज कठे ||
पति रो दुखड़ो बाँट सके ,बा सती सुहागण नार कठे|
घर ने सरग बणा सके ,बा लुगाई पाणीदार कठे ||
लुगाई ने सम्भाळ सके ,बो मर्द असरदार कठे|
धणयाणी ने समझ सके ,बो धणी समझदार कठे||
भरोसो नहीं टूटे किरोई ,इसो अबे व्योहार कठे |
खोट -मिलावट नहीं होवे ,इसो अबे व्योपार कठे||
माने माँ -बाप रो कहणो ,इसी अबे औलाद कठे|
जंग नहीं लागे जिण में, इसो अबे फौलाद कठे ||
देश रे खातिर मर मिटे ,इसा नेता आज कठे|
जनता रो दुखड़ो मिटा सके ,इसो अबे राज कठे||
आबादी ने रोक सके ,जनता में इसी जाग कठे|
गरीबी नहीं रेवे देश में ,देश रा इसा भाग कठे ||
झूठ -कपट ने रोक सके, इसा अबे लोग कठे |
सारा लोग सुखी हो जावे ,इसा अबे जोग कठे ||
बोली में मिश्री घोळ सके ,बा कोकिल कंठी नार कठे |
हिरदे में हेत जगा सके ,बा जीणे री आधार कठे ||
तन -मन ने निरोग राखे,इसी अबे खुराक कठे |
जुर्मी डर सू धूजण लागे ,पुलिस री इसी धाक कठे||
कायर ने वीर बणा सके ,कवियां रो बो सन्देश कठे |
दुश्मन धूजे जिण रे सामे ,वीरां रो बो देश कठे ||
देवी रो रूप दिखे जिण में ,छोरयाँ रो बिसो वेश कठे|
दुनिया ने मार्ग दिखाणे वाळो ,बो विश्वगुरु भारत देश कठे||
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