@@@@शादी@@@@

31 जनवरी 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (159 बार पढ़ा जा चुका है)

@@@@@@@@@ शादी @@@@@@@@@
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शादी के अनूठे सौदे में,बिक जाती अनमोल आजादी |
मनाते जश्न जिस गुलामी का ,वो कहलाती है शादी ||
शादी अगर सादी हो तो,बारातियों को नहीं आता मजा |
भोगते हैं स्वेच्छा से जिसको ,शादी है एक ऐसी सजा ||
कितना अनोखा है ये रिश्ता,जो जोड़ता है दो अजनबी जनों को |
उतार देते जो शर्म का पर्दा , और जोड़ लेते है अपने तनों को ||
नहीं है शादी वो खून का रिश्ता ,जो नहीं टूट सकता कभी |
पर सृजती शादी वे खून के रिश्ते,जो कायम रहते सदा सभी ||
शादी के अपावन रिश्ते से,बनता है पावन रिश्तों क़ा जाल |
फंस जाता जिसके फंदे में ,चाहे चले कोई कैसी ही चाल ||
शादी है एक ऐसा खेल , नर-नारी में होता मेल |
बिन जुर्म के दोनों को,हो जाती है आजीवन जेल ||
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