अजन्मी कन्या के मार्मिक वचन

31 जनवरी 2015   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (218 बार पढ़ा जा चुका है)

भ्रूणहत्या पर कटाक्ष करती कविता -
@@@@@@ अजन्मी कन्या के मार्मिक वचन @@@@@@
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भ्रूण -परीक्षण से गुजर चुकी गर्भवती नारी,
गहरी नींद में स्वप्न देखते सुन रही है ,
उदगार अपने गर्भ में पल रही बेटी के |
जो कह रही है उससे ,
मम्मा में नहीं जन्मना चाहती, इस पुरुष प्रधान समाज में ,
जहाँ विवश है नारी, काटने को अपना जीवन, पुरुष की पहरेदारी में |
नहीं भोगना चाहती मैं ,
मासूम बचपन के उस सुनहरे काल में ,
लड़की होने के जुर्म में कठोर पाबन्दियों का दण्ड|
नहीं भुगतना चाहती में भेद-भाव भैया से ,
भोले बचपन के उस स्वर्ण काल में |
मैं नहीं सामना कर सकूंगी यौवन की दहलीज पर ,
कामुकता भरी नज़रों का |
नहीं सहन हो सकेगी मुझसे, आजाद यौवन काल में ,
सास -ससुर की तानाशाही और दहेज़ के लिए तानों की वर्षा |
क्या पता किस मोड़ पर कोई पुरुष रुपी भेड़िया,
शिकार कर ले मेरी अस्मत का ,
और मैं ताजिन्दगी हो जाऊं मजबूर, तिल-तिलकर मरने को |
क्या गारन्टी है कि मैं जी पाऊं, इस पुरुष -प्रधान समाज में ,
सुरक्षित और सुकून भरी जिन्दगी|
जहाँ राम जैसे प्रतापी पुरुष की पत्नी का हो सकता है अपहरण ,
वहां साधारण नारी के सुरक्षित रहने की क्या है गारन्टी ?
जहाँ छोड़ सकते है राम, अपनी पतिव्रता पत्नी गर्भवती सीता को ,
जंगल में अकेला, बेसहारा ,बेहाल और बेबस ,
सिर्फ इसलिए कि उसने गुजारी थी एक रात ,
मजबूरी वश किसी और के आवास में|
जहाँ लेते हैं राम, अग्नि-परीक्षा सती सीता की ,
और सीता, अग्नि परीक्षा में सफल होने के बावजूद,
रोज -रोज की जिल्लत से बचने के लिए,
समा जाती है धरती माता के गर्भ में |
फिर भी पुरुष - प्रधान समाज,नहीं दोष देता है राम को ,
बल्कि मानता है उन्हें, महापुरुष और भगवान |
में कैसे करूँ विश्वास एक आम पुरुष पर ,
जब युधिष्ठर जैसा धर्मनिष्ट पुरुष,
जुए में लगा देता है दांव पर ,अपनी धर्मपत्नी को ,एक जड़ सम्पति की तरह |
जहाँ सती अहिल्या को देते हैं शाप, उसके पति -परमेश्वर सिर्फ इसलिए ,
कि उन्हें हो जाता है शक, अहिल्या के परम पावन चरित्र पर |
मैं कैसे करूँ भरोसा, उस तथाकथित भगवान पर ,
जिसकी बनायी दुनिया में ,
इतना अधिक है अत्याचार ,अनाचार ,दुराचार ,व्यभिचार और भ्रष्टाचार|
जहाँ मंदिर में तथाकथित भगवान का पुजारी ,
कर लेता है शिकार, दिन-दहाड़े किसी अबला की अस्मत का
और नहीं होता उस इंसानी - भेड़िये का बाल भी बांका |
जहाँ कलियुगी पिता लगा लेता है बेखौफ ,
अपनी ही पुत्री के यौवन -सागर में डुबकी ,
और करते हैं कुकर्मी भाई अपनी बहिन की अस्मत का सौदा |
जहाँ नारी की लाज को लूटते देख सकते हैं, भीष्म जैसे धर्मवीर,
और भरी सभा में खींच लेता है, दुष्ट दुशासन एक नारी का चीर ||
यूं जीते जी मर जाने की इन आशंकाओं के बीच ,
बार -बार मरने से अच्छा है कि मैं जन्म ही न लूं ,
नारी के लिए असुरक्षित इस संसार में |
यूं भाषणों और शास्त्रों में नारी को बताया जाता है देवी ,
पर हकीकत में माना जता है उसे ,
भोग का साधन ,विलास की वस्तु और पैर की जूती|
नहीं मंजूर है मुझे भोग का साधन बनना ,
पुरुष की गुलामी करना और दोयम दर्जे का इंसान बनकर पशुवत जिन्दगी जीना |
इसलिए करने दो मम्मा, डॉक्टर अंकल को मेरे जन्म से पहले ही मेरा अंतिम संस्कार |
और मेरी इस भ्रूण -ह्त्या के लिए तुम न होना कभी भी अपराध बोध का शिकार ||
भ्रूण -ह्त्या पाप है ,तो नारी जीवन अभिशाप है |
बचा लो मुझे इस अभिशाप से |
इतना सुनकर सोयी नारी जग पड़ी |
और भ्रूणहत्या की श्रृंखला में जुड़ गयी एक और कड़ी ||
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