एक ख़त " बेटी का माँ के नाम "

09 फरवरी 2016   |  योगिता वार्डे ( खत्री )   (587 बार पढ़ा जा चुका है)

एक ख़त " बेटी का माँ के नाम "

माँ मेरी माँ मुझे पता चला है,

मैं तेरी कोख में हूँ ,

ये जान ना लेना मेरी जान,

मैं डरने लगी हूँ , पिघलने लगी हूँ,

सोच यही की मैं लड़की हूँ ,

मुझे डर लगता है , ये जान ,

की पता चली मेरी पहचान 

तो तू मिटा ना दे तेरी लाड़ली

की पहचान ,

मैं नहीं करूँगी तंग तुझे,

बस मुझे अपनी भाहों मैं 

भरकर थोड़ा प्यार ही दिखा देना 

मैं ख़ुश हो जाऊँगी ,

मुझे जीना है इस दुनिया मैं माँ 

चाँद तारों से बातें करने का एक 

मोका तो दे माँ ,

ना ख़र्चे की सोच तू ओ माँ 

मैं भैया के कपड़ों से ही काम चलूँगी ।

इतनी बुरी नहीं हूँ मैं माँ की डर लगता 

है तुझको मुझसे , लड़का होता तो 

क्या तू ना रखती उसका ध्यान 

माँ मैं तो इस दुनिया मैं आऊँगी 

परायी अमानत बनकर,

हातों मैं मेहंदी रचेगी ,

फिर उड़ जाऊँगी मैं ,

मैं तो तेरी कोख मैं हूँ मेरी 

तो आवाज़ नहीं है ,

पर तू तो समझ सकती है ...

मुझे आना है इस दुनिया मैं

तेरी बेटी बनकर , बस मेरा यही 

कहना है, चीख़ - चीख़ कर ये कह 

रहीं हूँ मैं , मत मारना  मुझे 

बेरहमी से...... मेरी भगवान 

से यही प्रार्थना है की तुम हमेशा

ख़ुश रहो 

                   तुम्हारी 

              अजन्मी  बेटी 

 -- योगिता वार्डे " खत्री "





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धन्यवाद प्रियंका जी ये भ्रूण हत्या एक बड़ी ही जटिल समस्या है...!!!

बेहद भावुक कर दे ऐसी रचना !!!!

धन्यवाद ओम् प्रकाश जी !

मर्मस्पर्शी सार्थक रचना !

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