वातावरण प्रदूषण रोकने को उपाए

03 फरवरी 2015   |  विजय कुमार शर्मा   (425 बार पढ़ा जा चुका है)

बिल्लु एक टांगेवाला है। उसका रोजगार का साधन ही टांगा और घोड़ा हैं। रोजाना टांगा स्टैंड पर जाना और सवारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना। जब अच्छी कमाई हो गई तो अच्छा खाना पीना, मंदी रही तो जेब अनुसार घर का खर्च। एक दिन जब वह घर से निकल रहा था तो उसकी बीवी ने उसे बोला कि आज घर खर्च चलाने लायक पैसे उसके घर में नहीं हैं लेकिन उसे भरोसा था कि आज कमाई अच्छी होगी। वह स्टैंड पर खड़ा सवारियों को बुला-बुला कर अपने टांगे पर बैठाने लगा, सवारियां उसके टांगे में बैठ भी रहीं थी। केवल एक सवारी की जगह खाली थी। वह एक सवारी की आस में जोर-जोर से आवाजें लगाने लगा, मुलांपुर-मुलांपुर कोई एक सवार। जल्द ही एक सवार भी उसके टांगे में आया और खाली जगह पर बैठ गया। उसने सोचा कि आज आमदनी अच्छी हो जाएगी। इसलिए उसका मन बीड़ी के बजाए सिगरेट पीने को किया। वह सवारियों से भरा टांगा खड़ा करके सामने की दुकान पर सिगरेट खरीदने को गया। इतने में स्टैंड पर बस आ गई और टांगे की सभी सवारियां बस के पेट में घुस गईं और उसे खाली जेब घर की ओर प्रस्थान करना पड़ा। लुभाया एक गडरिया है। दिन रात मेहनत करके घर चलाता है। अच्छी आमदन हो गई तो अच्छा खाने का मन तो करेगा ही साथ ही साथ बीवी-बच्चों को भी अच्छा खिलाना चाहता है। मगर घर चलाना तो अधिकतर गृहणियों के ही जिम्मे होता है। अपनी कमाई से अपने निजी खर्च के बाद जो कुछ भी उसके पास बचता वह अपनी बीवी को थमा देता था। एक दिन घर पहुंचने पर उसने पाया कि रोजाना की ही भांति उसकी बीवी ने रोटी के साथ खाने में दाल बना रखी है(उन दिनों दाल-रोटी ही गरीबों को सस्ते मे उपलब्ध थी। आज तो आटे-दाल के भाव भी आसमान छू रहे हैं)। बीवी को मालूम था कि इतनी कमाई से दाल-रोटी का खर्च ही निकल सकता है। किंतु लुभाया उस दिन दारु से टुन्न था तथा उसकी हरकतें किसी अमीरजादे से कम न थीं। पहले तो उसने अपनी बीवी के साथ झगड़ा किया कि तुम रोजाना खाने में दाल ही क्यों बना लेती हो। फिर उसने यह कहते हुए दाल का पतीला बाहर फेंक दिया कि हम तुम्हें क्या दाल खाने वाले लगते हैं। अभी मैं बाजार जाता हूं और अच्छी सी तरकारी लेकर आता हुं। तुम बनाना और पूरा परिवार अच्छी भाजी खाएगा। एक झटके से वह बाजार की ओर निकल गया। मां ने बच्चों से बोला, लगता है कि आपके पिताजी आज आपके लिए मटन-चिकन सहित अनेक तरह की खाद्य सामग्री लाने वाले हैं तथा मुझे आज बहुत अधिक काम करना पड़ेगा। किंतु बाजार में पहुंचने पर लुभाया को आटे-दाल का भाव मालूम हुआ। उसकी जेब में जितने पैसे थे उनसे वह केवल बाजार में मिलने वाली सबसे सस्ती सब्जी बैंगन ही खरीद पाया। काली और हीरम नाम की दो भिखारिन महिलाएं। इनका काम है रोज बस अड्डे पर जाना। भिक्षा मांगने के लिए उन्हें मुंह से किसी को बोलना नहीं पड़ता। गरीब की फरियाद सुनो शीर्षक से एक कार्ड छपा रखा है। जिस किसी भी बस में चढ़े, यात्रियों से बिना पूछे कार्ड उनकी सीट पर रखना, न किसी से कुछ बोलने मांगने का झंझट। जो मिला उठाया बाकी के कार्ड समेटे तथा भिक्षा मांगने के लिए किसी दूसरी बस की तलाश। एक दिन भिक्षा मांगते हुए उन दोनो में किसी बात पर झगड़ा हो गया। झगड़े के दोरान वे दोनो एक दूसरी को एकही बात बार-बार दोहरा रहीं थी। तूने मेरी बस खराब करदी-तूने मेरी बस खराब करदी। लेखक भी उनका झगड़ा देखने वालों में से एक थे तथा सोचने पर ख्याल आया कि बस की खरीद पर पैसा लगा ट्रांस्पोर्टर का, स्वारी यात्रा करती है पैसा खर्च करके और बस की मालकिन हैं यह दोनो भिखारिन महिलाएं। इस बीच बस स्टैंड पर खड़ी बस का इंजन बराबर स्टार्ट था। क्योंकि प्राइवेट ट्रांस्पोर्टर अपनी सवारियों को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि आप बस में बैठिए. यह बस केवल आप का ही इंतजार कर रही थी और आपके बैठते ही तुरंत यह चल देगी। बाद में चाहे यह बस वहीं पर घंटों घर्र-घर्र करती रहे। रामू एक ऑटो चालक है। उसके ऑटो के इंजन को स्टार्ट करने से पूर्व पुली को कसकर रस्सी से लपेटकर जोर से खींचना पड़ता है। जबतक ऑटो भरता नहीं तब तक इंजन चालू रहेगा। मगर जब कोई सवारी अकेले ऑटो में बैठकर यात्रा करना चाहे तो रेट दोगुने या चौगुने बताता है। यही गाथा अनेक नगरों में जन परिवहन में लगे ड्राइवरों की है और वाहनों के लिए ईंधन के रुप में घासलेट मिला डीजल का प्रयोग भी करते हैं। एक-एक सवारी के लिए गला काट प्रतियोगिता। सवारी देखते-देखते कभी तो यह हाल होता है कि लाल बत्ती होने के कारण सामान्य यातायात तो रुक जाता है किंतु यह आगे-पीछे और कतारों में ऐसे चलते हैं जैसे राजपथ पर 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस की परेड मैं भाग ले रहे हों। रोजी(एक काल्पनिक नाम) सेना के अधिकारी की बेटी है। अपने पिता के तैनाती स्थल से दूर किसी और नगर में पढ़ती है। अपने पिता के तैनाती स्थल के छावनी क्षेत्र में जाने के लिए सुबह-सुबह वह बस से उतरी। बस से उतरते ही उस नगर के रिक्शा चालकों तथा ऑटो चालकों ने झुंड बनाकर उसे घेर लिया मगर जाने के लिए किसी से भाड़ा तय नहीं हो पाया क्योंकि उनकी ओर से मांगा गया किराया आम यात्री के लिए दे पाना संभव नहीं होता। लड़की ने गलती की और थोड़ा आगे सस्ता रिक्शा मिलने की आस में पैदल चलने लगी। सुबह चार बजे का समय था। नगर के तीन बिगड़ैल लड़कों ने नशे की हालत में उसे जबरदस्ती अपनी गाड़ी में बैठाने का प्रयास शुरु कर दिया। उसी समय एक बुजुर्ग सरदारजी सुबह की सैर के लिए वहां से निकल रहे थे। उन्होने बड़ी जद्दो-जहद के बाद लड़की को उन दरिदों के चंगुल से छुड़ाया। इस हाथापाई में वे स्वयं भी घायल हो गए किंतु लड़की को साथ ले जाकर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस शिकायत तथा जांच के बाद नगर वासियों को समाचारों के माध्यम से पता चला कि उन तीन बिगड़ैलों में नगर पुलिस के एसपी का बेटा भी शामिल था। दिल्ली के भयानक निर्भया कांड में भी लड़की के मित्र की यही शिकायत थी कि अगर उन्हें उचित भाड़े पर ऑटो मिल जाता तो शायद यह दुखद घटना नहीं होती। लेखक अपनी सेवाकाल के आरंभ में साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखे हुए थे तथा बहुत से अन्य परिक्षार्थिओं की भांति पंजाब के पूर्व शासक के समर पैलेस(अब कंपनी बाग के नाम से परिचित) में पढ़ने के लिए जाया करते थे। उन दिनों में फलों के पेड़ों से होने वाली उपज को उतारने के लिए स्शानीय नगर निगम ठेका आबंटित किया करती थी। ठेकेदार तथा कर्मचारी भी टैंट लगाकर उसी बाग में रहा करते थे। इसी बाग में सिविल डिफैंस का कार्यालय था तथा सरकारी कर्मचारी सिविल डिफैंस का प्रशिक्षण लेने के लिए बैचों में आते थे। जाहिर है कि महिला और पुरुष कर्मचारी इकट्ठे ही प्रशिक्षण क्लासों में बैठेंगे तथा चायपान व भोजन भी इकट्ठे करेंगे क्योंकि उन में से अधिकतर का तो विभाग एक ही होता था। एक दिन जब लेखक अपने स्थान पर बैठे पढ़ रहे थे तो ठेकेदार का एक आदमी बहुत शिद्दत से पास आकर बोला – बाबूजी जब आप पढ़ लिखकर नौकरी पर लग जाएंगे तो आपभी वही करिएगा जो यह लोग कर रहे हैं । मुझे अजीब लगने वाली कोई बात दिखी नहीं किंतु उस सामान्य व्यक्ति के लिए अगर महिला-पुरुष आपस में बातचीत भी करलें तो बहुत है। इसी नगर में महाराजा रंजीत सिंह का किला भी है जिसमें आज के दिनों में भी सेना रहती है। आजकल तो सिविलियन का प्रवेश निशिद्ध है किंतु लेखक अपने बाल्यकाल में आमतौर पर अन्य बच्चों के साथ खेलने के लिए सेना की ओर से संचालित खेल कार्यक्रमों/चलचित्रों को देखने के लिए जाया करते थे। उन दिनों सेना के अनेक जवान हमसें कुछ बाते पूछा करते थे। उनकी बातों का अर्थ हमें उन दिनों तो समझ नहीं आता था किंतु बाद के आलोक में देखें तो उनकी समस्याओं से संबंधित अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। पंजाब में आतंकवाद का दौर था तथा उन दिनो बसों में सुरक्षा हेतु पुलिस के जवान भी तैनात किए जाते थे। एक बार की घटना है कि लेखक भी बस में यात्रा कर रहे थे। इसी बस में एक बिल्कुल सामान्य परिवार की अवस्यक लड़की चढ़ी। उसे बैठने के लिए वहीं जगह मिली यहां पुलिस के जवान बैठे हुए थे । उस स्थान पर उसे बहुत ही सुरक्षित महसूस करना चाहिए था क्योंकि कानून के रक्षक जो पास में बैठे हुए थे । किंतु ऐसा हुआ नहीं और वह लड़की बैठने के स्थान से उठकर उसे मिली खाली जगह पर खड़ी हो गई। उसके खड़े होने के कारण का अंदाज लगाना कठिन नहीं है। एक बार लेखक भारत के सबसे बड़े अस्थायी आवास भारतीय रेल की शयनयान श्रेणी के आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। एक स्टेशन से एक लड़का और लड़की रेलगाड़ी में चढ़े। उनकी सीट भी आरक्षित नहीं थी। किंतु एक तो उन्हें गाड़ी में बैठाने के लिए बहुत से लड़के आए हुए थे तथा बार-बार लड़कें को जोर दे रहे थे कि उस लड़की का वो पूरा ध्यान रखे। उनका वार्तालाप लेखक सहित सभी सह यात्री सुन रहे थे। अन्य लड़कों के जाते ही दोनो एक यात्री की सीट पर बैठ गए तथा बिना आस-पास के माहौल की परवाह किए एक-दूसरे के हाथों से और एक-दूसरे के मूंह में खाने का सामान डाल कर खिलाने लगे जैसे वो अकेले ही उस कोच में मौजूद हैं दूसरा ओर कोई वहां है ही नहीं। मगर जब टीसी आया तो सीट आरक्षित तक कराने के लिए पूरे पैसे उनके पास नहीं थे। सोचिए अगर उनकी शादी हो जाए जोकि अकसर फिल्मों में दिखाया जाता है तो वास्तविकता क्या होगी। जरा सोचिए एक टांगा चालक जिसे अच्छी सवारियां मिल जाएं तो उसके बीड़ी की बजाए सिगरेट पीने से कितना प्रदूषण बढ़ता, ऑटो या बस के इंधन के जलने से अधिक तो कतई नहीं। गडरिया भी अगर दारु पीकर ध्वनि प्रदूषण फैलाता तो कितना, कारखानों के शोर, रासायणों या मोबाइल के कचरे से अधिक तो कभी नहीं। पिछले दिनों सरकार बार-बार सोने का रेट बढ़ा रही थी। आशय यही था कि भारतीय जनता कम सोना खरीदेगी जिससे विदेशी मुद्रा बचेगी। किंतु जरा सोचिए विश्व के सबसे बड़े प्रदूषण फैलाने वाले देश अमरीका की मोबाइल कंपनी एप्पल की अक्तूबर-दिसंबर, 2014 तिमाही की आय 74.6 अरब डॉलर है जोकि मलेशिया(सालाना बजट-59.8 अरब डॉलर),बांगलादेश(सालाना बजट-12.7 अरब डॉलर) और पाकिस्तान(सालाना बजट-35 अरब डॉलर) जैसे देशों के कुल वार्षिक बजट से अधिक है। यह रिकॉर्ड वृद्धि आइफोन की रिकॉर्ड बिक्री की वजह से है। सोचिए भारत कितना बड़ा बाजार है इन मोबाइल कंपनिओं के लिए। मगर जो मोबाइल वेस्ट होने पर कचरा बनेगा उसके प्रबंधन की व्यवस्था क्या भारत के पास है? विदेशी संस्कृति से प्रभावित चैनल तथा चलचित्रों(सोशल मीडिया सहित) के चलन से भारतीय संस्कृति पर प्रभाव और उनपर प्रतिक्रिया देने वालों के कारण पुराने समय के मुकाबले वर्तमान में वातावरण पर पड़ने वाले प्रभाव अधिक घातक हैं। किंतु इनकी रोकथाम के लिए कभी कोई ब्यान आएगा कि महिलाएं जींस न पहनें। कभी कोई विचार आ जाएगा कि सारा कसूर महिलाओं का ही है। कभी कोई राजनीतिक दल यह घोषणा कर देता है कि हमारी सरकार आजाने पर हमतो बसों में, गाड़ियों में पुलिस लगा देंगे। सुरक्षा बलों के अधिकतर जवान तो पहले से ही घर से दूर रहते हैं। आए दिन उनकी घरेलू परेशानिओं के किस्से सामने आते रहते हैं। और अभी हाल ही में एक रहस्योदघाटन हुआ है कि बार्डर पर होने वाली झड़पों, आतंकवादिओं से मुठभेड़ों में तथा नकस्लियों से मुकाबले के दौरान पुलिस/अर्धसैनिक बलों/सेना के उतने जवान नहीं मरते जितने स्वास्थ्य और घरेलू परेशानी के कारण। इसलिए जरुरी है कि चाहे कोई दिहाड़ीदार हो, व्यापारी हो या कर्मचारी सभी को अच्छा रोजगार मिले जिससे वे कमाने लायक होते ही अपनी जरुरतें अच्छी तरह से पूरी कर सकेंगे। इससे युवाओं को शादी लायक होने पर आसानी से मैच मिल जाएंगे। ऐसा हो जाने पर माता-पिता भी अपने बच्चों का पालन-पोषण अच्छे ढंग से कर सकेंगे। आमदन अच्छी होगी तो जरुरतें भी अच्छी तरह से पूरी होंगी और निजी जन परिवहन पद्धति भी नागरिकों को अच्छी सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम होगी। मगर हो इसका उल्टा रहा है। संविधान की प्रस्तावना में उपलब्ध समाजवाद शब्द पर भी कुछ लोग विवाद खड़ा कर रहे हैं। भारतीय नागरिकों को अच्छे रोजगार तथा वेतन की गारंटी मिल सके, इसीलिए ही तो समाजवाद शब्द भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया है। अन्यथा नियोक्ता वर्ग तो कर्मचारी को कुछ देने के लिए बामुश्किल तैयार होता है। ताजा उदाहरण किंगफीशर विवाद है। कर्मचारियों को तो वेतन मिला नहीं। 14 करोड़ का क्रिकेट खिलाड़ी आसानी से खरीदा गया। भारतीय नागरिकों को बराबरी का मौका देकर और पश्चिमी सभ्यता के दुष्प्रभावों से दूर रखकर महिलाओं के प्रति फैलाया जा रहा प्रदूषण भी कम होगा। सक्षम होने के बाद भी अगर कोई उक्त किस्म के प्रदूषण फैलाकर वातावरण को प्रदूषित करता है तो उसे किसी भी हालत में क्षमा नहीं करना चाहिए ।

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धन्यवाद अजय जी

धन्यवाद शिखाजी

सटीक लिखा है आपने .उत्तम विचार .बधाई

अजय शर्मा
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बहुत ही अच्छा विषहै है हमें इस की तरफ कुश करना चाहिए

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