विश्व महिला दिवस पर एक कुंडलिया

08 मार्च 2016   |  महातम मिश्रा   (213 बार पढ़ा जा चुका है)

सादर शुभ प्रभात मित्रों,

आज विश्व महिला दिवस पर मंच की सभी महिला मित्रों को सादर प्रणाम, महिला शक्ति को सादर नमन। मुझे लगता है कि आज हमें अपने अंतरमन से यह जरूर पुछना चाहिए कि क्या हमारे अबतक के जीवन का एक पल भी बिना किसी महिला के साथ के व्यतित हुआ है। अगर उत्तर नहीं है तो पीछे मुड़कर देखें, जन्म दिया, एक माँ ने जो एक महिला है, बचपन को दुलरा कर हर पल साथ निभाया एक बहन ने, जो एक महिला है। गृहस्थ जीवन में जीवन संगिनी बन पत्नी ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, वह भी एक महिला है। सबका जीवन कर्म-धर्म अपने लिए होता है पर उसको दान में जिसने परिमार्जित किया वह एक बेटी है, जो एक महिला है। बूढ़ापे में जब किसी का सहारा करीब नहीं रहता तो एक बच्चे को गोदी में डालकर बचपन को दुलराने का सौभाग्य भी प्रदान किया इसी महिला ने। हर पल दूसरों के लिए जीने वाली इस महान शक्सीयत को बदले में हमने क्या दिया इस पर आज दिल से विचार जरूर होना चाहिए। 

मैथिली शरण गुप्त जी की ये पंक्तिया आज याद आ रही है और प्रश्न कर रही हैं कि शिखर पर पहुँचने वाली नारी की आँखों में आज फिर से आँसू .......

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी 

आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।........ है तो क्यों है। जिसको महाभारत में कहा गया है कि, पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील, विश्व के लिए दया और जीव मात्र के लिए करुणा संजोने वाली महाप्रकृति का नाम ही नारी है। जो आदिशक्ति है अत: इतना ही कहूँगा कि जिस घर में महिला का सम्मान होता है वहीं जीवन के सारे पुष्प पल्लवित होते हैं। आज मेरी यह कुंडलिया उन माँ- बहनों को सादर समर्पित है जिन्होंने हमें पुरुषत्व पर चलना सिखाया......जय हो महिला शक्ति की........ 

"कुंडलिया"

माँ ममता स्नेह बहन, मातृछाया दुलार

बिना चाह अपना मिले, बिना राह अधिकार

बिना राह अधिकार, जुड़े अंजाना रिश्ता 

नारी नर साकार, उगाएं जीवन पिश्ता

कह गौतम कविराय, सहति न पाप धरती माँ

जब भी लौटी असहाय, धरी है रूप दुर्गा माँ।।

महातम मिश्र (गौतम)

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08 मार्च 2018

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