कविता

11 मार्च 2016   |  दीपक श्रीवास्तव   (150 बार पढ़ा जा चुका है)

मटमैले

चादरों की

सिलवटों से

लिपटी

विस्मृत हो चुकी

स्मृतियों से

चिपककर

अतीत की

अनन्त गहराईयों में

झाँक;

बोझिल हो रही

पलकों के

कपाट को

खोलने

बंद करने

कि;

जद्दोजहद में

बमुश्किल

रोज़

बीत जाती है

रातें

और;

सुबह

शेष रहते है

तकियों के

गिलाफ़ों पर

आँसू की

मोटी मोटी

बून्दों की

छाप

जो;

वयां करते है

रात्रि के

सफर की

दर्द भरी

कहानी !!

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