ग़ज़ल

13 मार्च 2016   |  दीपक श्रीवास्तव   (143 बार पढ़ा जा चुका है)

 अली रे आली

बन जा

इस जहाँ का माली

तू आदिल बन

आफ़ताब हो जा

आजिम बन

महताब हो जा

आवाज़ह से

मत हो आशुफ़्ता

अब-ए-आईने में

आसिम

आजिज़ हो

आकिबत को

रुखसती कर

आब-ए-चश्म से

शख्सीयत को

बेपरवाह करेगें

अली रे आली

तू; है,

इस जहाँ का माली !!

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