उससे कहना...

16 मार्च 2016   |  ओम प्रकाश शर्मा   (133 बार पढ़ा जा चुका है)

उससे कहना...

उससे  कहना  कि  कमाई  के न चक्कर में रहे

दौर  अच्छा  नहीं,  बेहतर है कि वो घर में रहे I


जब  तराशे  गए   तब  उनकी  हक़ीक़त  उभरी,

वरना कुछ रूप तो सदियों किसी पत्थर में रहे I


दूरियाँ  ऐसी  कि  दुनिया  ने  न  देखीं  न  सुनीं,

वो  भी  उससे  जो  मिरे  घर  के बराबर में रहे I


वो  ग़ज़ल  है  तो  उसे छूने की ह़ाजत भी नहीं,

इतना  काफ़ी  है  मिरे  शेर  के  पैकर  में  रहे I


तेरे   लिक्खे   हुए   ख़त  भेज  रहा  हूँ  तुझको,

यूँ  ही  बेकार  में  क्यों   दर्द  तिरे  सर  में  रहे I


ज़िन्दगी  इतना  अगर  दे  तो ये काफ़ी है ’अना’

सर  से  चादर  न  हटे, पाँव  भी चादर  में  रहे I

-'अना' क़ासमी

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