Kaveeta

17 मार्च 2016   |  दीपक श्रीवास्तव   (153 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं;

रोज

देखता हूँ

सरसोई

फ्राक में

घूंघराले बालो वाली

उस;

नन्ही

लड़की को

जो;

सरगोशी के साथ

भीड़ भरे बाज़ार में

गुब्बारों का

गुलदस्ता लिए

कभी रोड की

इस पटरी पर

तो कभी

रोड की

उस पटरी पर

बेचती है

रंग-बिरंगे

गुब्बारे

अपनी ही

उम्र के

उन

नन्हें-मुन्नों को

जो;

लकदक करती

गाड़ियों से उतर

राजा बाबू बन

रुआब से

खरीदते है

गुब्बारे

और;

वह

कभी

अचम्भित नजरों से

तो कभी

विस्फारित नज़रो से

देखती है उन्हें

उसका मूक स्वर

स्फूटित हो

मुखरित

हो जाता है

कुछ;

न कहते हुए भी

बहुत कुछ

कह जाती है

वह सयानी

लड़की !!

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