कविता

19 मार्च 2016   |  दीपक श्रीवास्तव   (132 बार पढ़ा जा चुका है)

एक

नन्हा

कबाड़ी

रोज़

मेरे

घर के

पिछावड़े

के;

कूड़ेदान में

तलाशता है

कबाड़

और;

फिर

समपर्ण भाव से

उन्हे

एकत्र कर

ले जाता है

अपने साथ

इस उद्देश्य के

निहित

कि;

प्राप्त

सामग्री को

झाड़ पोछ

चमका कर

टूट फूट की

मरम्मत कर

या;

गला पिघलाकर

नया आकार दे

पुर्न: स्थापित

करेगा

बाज़ार में!

कमोवेश

वह

नन्हा बालक भी तो

है;

कबाड़ सरीखा

पर;

उसे

झाड़-पोछ कर

चमका कर

नया स्वरूप

देकर

समाज में

समायोजित

करने की कूबत

किसी में

नही है !!

अगला लेख: Kaveeta



बहुत खूब

रवि कुमार
21 मार्च 2016

दीपक जी, मन छू जाती है ऐसी रचना

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