कविता

19 मार्च 2016   |  दीपक श्रीवास्तव   (147 बार पढ़ा जा चुका है)

एक 

व्यस्तम

चौराहे के

घूर पर

कुत्तो के 

झुण्ड के बीच

पड़ी ; 

नवजात बच्ची ! 

उनकी 

गुर्राहट सुन

कभी 

अपनी

सामर्थ्य अनुसार

चित्कार रही है

तो ; 

कभी 

हाँथ-पाँव

चलाकर 

अपने

जीवित होने का 

प्रमाण दे रही है ! 

और  ; 

स्वानों का झुण्ड

खूनी आंखों से

यमदूत की भाँति 

गोश्त के 

लोथड़े को देख

उसको 

नोचने खसोटने को 

तत्पर है ! 

तभी

कुछ अपरिचित हाँथ

उसे लपककर 

सरकारी

अनाथालय में

सुपुर्द करते हैं

जहाँ ; 

अल्पायु में ही 

वह ; 

जवान हो

अपने आपको

उसी

दोराहे पर

फिर  ; 

पाती है ! 

आज भी 

वह ; 

हिंशक

कुत्तो और भेड़ियों से

से घिरकर

अपने स्वाभिमान

व 

आस्तित्व की सुरक्षा

के लिए

कर रही है 

संघर्ष ! 

जबकि ; 

उसके शरीर को 

हर कोणों से

निहार

उसकी 

सुगन्ध से

मदहोश हो चुके

भेड़िये

उसे

दबोचने को

आतुर हैं !!

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प्रतीकात्मक अर्थ से परिपूर्ण बेहद सार्थक रचना

रवि कुमार
21 मार्च 2016

मुझे हर महिला मे एक माँ, बहन और दोस्त का रूप दिखता है. respect woman

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