मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !

27 मार्च 2016   |  डॉ. शिखा कौशिक   (119 बार पढ़ा जा चुका है)


देख दुःखों में डूबा मुझको ;

जिनके उर आनंद मनें ,

किन्तु मेरे रह समीप ;

मेरे जो हमदर्द बनें ,

ढोंग मित्रता का किंचिंत ऐसा न मुझको भाता !

मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !

 सुन्दर -मँहगे उपहारों से ;

भर दें जो झोली मेरी ,,

पर संकट के क्षण में जो ;

आने में करते देरी ,

तुम्हीं बताओ कैसे रखूँ उनसे मैं नेह का नाता !

मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !

नहीं तड़पता गर दिल उनका ;

जब आँख मेरी नम होती है ,

देख तरक्की मेरी उनको ;

यदि जलन सी होती है ,

कंटक युक्त हार फूल का मुझको लाकर पहनाता !

मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !



शिखा कौशिक 'नूतन '



उषा यादव
21 अप्रैल 2016

तुम्हीं बताओ कैसे रखूँ उनसे मैं नेह का नाता ! बहुत सुन्दर रचना !

अति उत्तम |

बहुत खूब !

बिल्कुल सटीक विचार डॉ शिखा जी ढोंगी मित्रों से दूर रहना ही बैहतर है । आपकी रचना अच्छा संदेश दे रही है

"कंटक युक्त हार फूल का मुझको लाकर पहनाता ! मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !" बहुत सुन्दर !

रवि कुमार
29 मार्च 2016

बेहद अच्छी लगी

manobhavon ka sundar vishleshan kiya hai aapne .

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