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सुंदर होना बुद्धिमता की निशानी नहीं

11 फरवरी 2015   |  विजय कुमार शर्मा

हजारों वर्ष पहले का किस्सा है कि सिकंदर के गुरू अरस्तु एक बाग में बैठकर अध्ययन कर रहे थे। एक महिला आई ओर अरस्तु से शादी करने की जिद करने लगी। अरस्तु ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। किंतु महिला नहीं मानी तथा अपनी बात मनवाने को अड़ी रही। अरस्तु ने उससे पूछा कि तुम मेरे साथ शादी क्यों करना चाहती हो। उस महिला ने कहा कि मैं चाहती हूं कि मेरी औलाद तुम्हारी तरह बुद्धिमान हो। इस पर उस महिला ने अरस्तु से पूछा कि तुम मेरे साथ शादी क्यों नहीं करना चाहते जबकि मैं बहुत खूबसूरत हूं। इस पर अरस्तु ने उत्तर दिया कि मैं तुमसे इसलिए शादी नहीं करना चाहता कि अगर बच्चे की शक्ल मुझ पर चली गई और अक्ल तुम पर - तो उसका समाज में कुछ भी नहीं बनेगा।


पुराने जमाने की बात हे कि एक राजा की नगरी में एक फकीर आधी रात को जोर-जोर से हाक लगा रहा था कि जो फकीर को भोजन कराएगा मुंह मांगी मुराद पाएगा। राजा के घर में कोई औलाद नहीं थी। इसलिए तुरंत उसने फकीर को अंदर बुलाकर भोजन कराया। फकीर ने प्रसन्न होकर उसकी प्रत्येक रानी को एक-एक फल देते हुए वरदान दिया कि सभी को औलाद होगी। सभी रानियों ने अपना-अपना फल सोने से पूर्व ही खा लिया। एक रानी ने फल को आले में रखा और इसे सुबह खाने की इच्छा लिए सो गई। सुबह उठकर उसने उस फल को खा लिया। किंतु रात को उस फल को नेवले ने जूठा कर दिया था। सभी रानिओं के यहां सुंदर औलाद पैदा हुई किंतु उस रानी के जहां बहुत ही बुद्धिमान नयौलभाई पैदा हो गया। बाकी रानियां तो खुश रहने लगीं किंतु उस रानी का परेशान होना स्वाभाविक था। जब सभी बेटे जवान हो गए तो राजा के आदेश पर सभी को कमाई करने के लिए जाने का आदेश हुआ। शर्त यह थी कि जो अच्छी कमाई करके लाएगा राजपाठ उसी के सुपुर्द होगा। सभी भाई पिता की आज्ञा पाकर दूसरे नगर की ओर अच्छी कमाई की चाह में निकल पड़े। रास्ते में उन्हें फलों का बाग नजर आया। फल बहुत ऊंचाई पर थे जिन्हें बाकी भाईयों का चढ़कर उतार पाना संभव नहीं था। नयौलभाई पेड़ के ऊपर चढ़कर पके-पके फल तो स्वयं खाता किंतु कच्चे फल भाईयों की ओर फैंकता था कर्योंकि उसके भाई उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। उसके भाईयों ने बाग के मालिक से शिकायत की और बाग के मालिक ने नयौलभाई को पकड़कर बांध दिया। उसके भाई उसे वहीं छोड़कर चले गए। मगर नयौलभाई का दिमाग किस समय काम आता। वह अपनी होशियारी से छूटकर वहीं पहुंच गया जहां उसके भाई नौकरी करने के लिए पहुंचे थे। सभी को अच्छी नौकरी मिल गई किंतु नयौलभाई को एक संपन्न कुमहार के यहां नौकरी मिल पाई। वापसी का समय करीब था। सभी भाईयों ने अच्छी कमाई करली थी। किंतु नयौलभाई के पास कुछ भी नहीं था। एक दिन उसने अपनी चालाकी से मालिक के खजाने का पता लगा लिया और एक कानी व लंगड़ी गधी को खिला दिया। वापसी के अवसर पर सभी भाईयों ने अच्छी-अच्छी चीजें अपने मालिकों से लीं और घर की ओर प्रस्थान किया। नयौलभाई ने भी अपनी कानी और लंगड़ी गधी अपने भाईयों के घोड़ों के पीछे लगादी। घर के नजदीक पहुंचने पर सभी की माताएं अपने पुत्रों का सामान देखकर खुश हो गईं किंतु नयौलभाई की माता ने जब अपने बेटे को कानी-लंगड़ी गधी पर आते देखा तो उसका निराश होना स्वाभाविक था। रात को उसने अपनी माता से कहकर गधी को छतपर चढ़ाया। छत पर छेद करके जब-जब गधी का पेट दबाया जाता मोहरें नीचे गिरती जातीं। बाकियों को जब पता चला कि गधी के पेट से मोहरें निकलती हैं तो उन्होंने अपना-अपना सभी सामान देकर उस गधी को खरीद लिया। जब उन्होंने मोहरें निकालने का प्रयास किया तो केवल एक खोटी मोहर बाहर आई। नयौलभाई इस कमाई से अपनी माता के साथ खुशहाल जिंदगी जीने लगा।

विजय कुमार शर्मा

मैं राजनीति शास्त्र एवं हिंदी में एम.ए हुं, अपने विभाग में यूनियन का अध्यक्ष रह चुका हुं, जिला इंटक बठिंडा का वरिष्ठ उप प्रधान रह चुका हुं, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, बठिंडा एवं भुवनेश्वर का सदस्य-सचिव रह चुका हुं, आयकर विभाग में सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत रह चुका हुं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर हिंदी मामलों से संबंधित विशेषज्ञ पेनलों एवं हिंदी संगोष्टियों का हिस्सा रह चुका हुं, अलग-अलग नाम से विभागीय और नराकास की 12 से भी अधिक पत्रिकाओं का संपादक रह चुका हुं तथा वर्तमान में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में राजभाषा अधिकारी के पद पर तैनात हुं और स्वयं की ओर से लिखित पुस्तकों का लेखक भी हूँ

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