अच्छा लगता है

15 अप्रैल 2016   |  विजय कनौजिया   (78 बार पढ़ा जा चुका है)

अच्छा लगता है
कभी कभी अतीत के पन्नो को पलटना
किसी पृष्ठ पर रुक कर उसे हौले से सहलाना
और उस पर उभर आई तस्वीरों में कुछ देर के लिए गुम हो जाना

अच्छा लगता है
चलते चलते कभी ठिठक जाना
पीछे मुड़कर पगडंडियों के घुमाव को देखना
और अपने स्थितिजन्य साहस पर आत्म-मुग्ध हो जाना

अच्छा लगता है
कभी, किसी का, "हमारे अनकहे" को समझ जाना
अपनी निःशब्द बातों का प्रत्युत्तर पाना
और अंतह की रिक्तता का मधुर अहसासों से भर जाना.....
विजय कनौजिया



अच्छी रचना विजय जी ! बधाई !

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