छिपा हुआ सत्य

26 अप्रैल 2016   |  ओम प्रकाश शर्मा   (288 बार पढ़ा जा चुका है)

छिपा हुआ सत्य

कितना अद्भुत, कितना सत्य !

यह घटना भूमध्यसागर के सिसली द्वीप की है। अपराह्न के समय, सड़क पर अपने काम-धंधों में व्यस्त लोगों तथा व्यापारियों का जमघट लगा था। अचानक एक ज़ोर की आवाज़ सुनाई दी, 'मिल गया, मिल गया।' एक नंगा आदमी सड़क के बीचो-बीच दौड़ रहा था।  वह इतना आनंदविभोर था कि उसे स्वयं के निर्वस्त्र होने की परवाह ही नहीं। लोगों की भीड़ अत्यन्त विस्मय एवं आश्चर्य से उसे भागते देख रही थी।

कौन था वह ? वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि एक महँ वैज्ञानिक थम जिसने कभी कहा था कि यदि उसे दृढ़ता के साथ खड़े होने को एक स्थान मिल जाए, एक पर्याप्त लम्बा उत्तोलक और समुचित तक मिल जाए, तो वह पृथ्वी को उसके स्थान से उठा देगा। उसका नाम आर्किमिडीज़ था। उस दिन 'मिल गया, मिल गया' चिल्लाता हुआ वह भीड़ भरी सड़क पर नंगा क्यों दौड़ा ? उसने ऐसा क्या देखा था ?

बात ये थी की सिराक्यूस के राजा हेरो ने एक स्वर्णकार को सोने का एक मुकुट बनाने को कहा था। उसके मुकुट बनकर लाने पर राजा को संदेह हुआ कि कहीं इसमें कोई खोट तो नहीं ! उन्हें किसी गवाह पर विश्वास नहीं था। दरबार के विद्वानों  समक्ष यह चुनौती थी कि वे स्वर्ण की शुद्धता को प्रमाणित करें और आर्किमिडीज़ ने इसे स्वीकार कर लिया था।

आर्किमिडीज़ ने घर लौटने के बाद इस समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया। वह अपने मन को एकाग्र करके इस विषय पर गहन चिंतन में डूब गया और पदार्थ के गुणों के बारे में सोचने लगा। स्नान के लिए तैयारी करते हुए भी उसका मन इसी पहेली का हल ढूंढने में ही व्यस्त था। पानी से भरे हुए टब में उतरते समय वह फिसलकर उसी में गिर पड़ा। टब में लबालब भरा हुआ पानी किनारों से होकर बहने लगा। उसके मन में एक विचार कौंध गया। अब वह 'विस्थापन' और 'आपेक्षिक घनत्व' के सिद्धांतों का आविष्कार कर चुका था, जिसके द्वारा वह जांच कर सकता था कि राजमुकुट शुद्ध सोने का है या मिलावटी। इस खोज पर परम हर्षित होकर वह टब से बाहर कूदा और 'मिल गया, मिल गया' चिल्लाता हुआ भागा। उसे यह होश नहीं रहा कि वह निर्वस्त्र है।

आर्किमिडीज़ ने इस समस्या का हल ढूँढ़ने के लिए उस पर पूर्ण एकाग्रता के साथ चिंतन किया था। इस कठिन प्रश्न का समाधान पाने के प्रयास में उसने अपने मन की सारी शक्ति लगा दी थी। उसने दिन-रात उसी पर विचार किया  और अंततः इस खोज के आनन्द से वह इतना भावविभोर हो गया कि उसे बाक़ी किसी भी चीज़ की सुध नहीं रही। परिश्रम का फल ऐसा ही होता है। सुप्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने एक बार कहा था, 'जब सारा मन एकजुट होकर कार्य करता है, तभी जीवन में कुछ उपलब्धि होती है।' आर्किमिडीज़ ने जीने की यही कला अपनाई थी।         

 

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