लघुकथा-सांझे सपने

29 मई 2016   |  ओमप्रकाश क्षत्रिय '' प्रकाश -   (91 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा- साँझे सपने

पिछली बार प्याज को रोड़ी में फेकना पड़ा. मगर, इस बार भाव अच्छे थे, “ बाबा ! इस बार तो मुझे नया मोबाइल दिला दोगे ना ?” कालेज में पढने का सपना देखने वाले छोटे लड़के ने पूछा तो उस की माँ बोली, “ पहले छुटकी का ब्याह करना है. उस के लिए गहनेकपडे लेने होंगे.”

“ नहीं माँ ! पहले आप का कमरबंद और सोने का हार सुनार के यहाँ से वापस ले आइएगा. फिर मेरा ब्याह करने की सोचिएगा.”

“ तब तो पहले बाबा के लिए, मोटर साइकिल खरीदनी चाहिए. बाबा को रोज ५ किलोमीटर दूर खेत पर पैदल जाना पड़ता है.”

“ नहीं रे ! मुझे नहीं चाहिए. पैदल जाने से सेहत अच्छी रहती है.” बाबा ने बीडी पीते हुए कहा, “ पहले तेरा नया मोबाइल आ जाए और छुटकी का ब्याह हो जाए तो समझे की गंगा नहा गए,” बाबा ने यही बोला था कि पुराने मोबाइल की घंटी बज उठी. शहर में नौकरी करने वाले बड़े भाई का फोन था. जिसे सुन कर बाबा के चेहरे का रंग बदल रहा था.

“ भैया ! यह खेत आप का भी है. मुझे खर्चापानी नहीं चाहिए. आप, आप के हिस्से का मालपानी ले जाइएगा.” कहते ही बाबा को गत वर्ष रोड़ी में फेंके गए प्याज और अपने ऊपर पड़े सभी हर्जेखर्चे की याद आ गई जब इन्ही भाई साहब ने कहा था , “ भाई ! मुझे न तो प्याज की कमाई से हिस्सा चाहिए और न मैं खर्चपानी दूंगा.”

यह सुनते ही सभी को एकदूसरे के सपने धुंधले होते हुए दिखाई दे रहे थे.

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१७/०५/२०१६   

ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"  



भाई !!!! सच ही है भाई का चित्रण।

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