जीने की राह

31 मई 2016   |  प्रिंस सिंघल   (312 बार पढ़ा जा चुका है)

रामपुर गांव की एक गली में एक बुढ़िया रहती थी . बुढ़िया की उम्र लगभग 80 वर्ष से कम नही थी.  कहने को तो बुढ़िया के 2 बटे थे,  लेकिन दोनों ही बुढ़िया को गाँव में मरने के लिये अकेली छोड़ दूर शहर में जा बसे. बुढ़िया घूम घूम कर अपने लिये भोजन इक्क्ट्ठा करती और अपना पेट भर कर सो जाती. उसका जीवन निरर्थक था. सिवाय अब उसे अपनी मौत के किसी का इंतज़ार न था. बुढ़िया जिस गली  में रहती थी उसके नुक्कड़ पर एक छोटा सा नाला था जिसकी वजह से वहाँ कीचड़ हो जाती थी और बरसात के मौसम में तो वहाँ अधिक फिसलन और कीचड़ रहती थी. एक दिन की बात है वहाँ से रात के समय गुज़रते हुए एक राहगीर का पैर फिसल गया, वह गिर पड़ा, उसे काफ़ी चोट आयी. पास ही से गुज़रती बुढ़िया ने सब देख लिया और उसे उठाकर घर ले आयी एवम उसकी देखभाल करने के बाद वह नुक्कड़ पर एक तेल का दीपक जलाकर रख आयी, जिससे रोशनी हो गयी और आने जाने वालो को रास्ता दिखने लगा. अब बुढ़िया रोज़ रात को वहाँ पर एक तेल का दीपक जला कर रख देती  जिससे वहाँ से गुजरने वाले राहगीर को रास्ता स्पष्ट नज़र आता और वह आसानी से वहाँ से गुज़र जाता. इस तरह बुढ़िया लोगो को रास्ता दिखाने लगी और अब उसे जीने की राह मिल गयी थी. 

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mhavirsinghal
08 जून 2016

Very best

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