बघुवार-स्वराज मुमकिन है।

02 जून 2016   |  सुशील कुमार शर्मा   (201 बार पढ़ा जा चुका है)

बघुवार-स्वराज मुमकिन है।



सुशील कुमार शर्मा

archanasharma891@gmail .com


मायाजी की इस पुस्तक का विमोचन ग्राम बघुवार में हो रहा था। ABP न्यूज़ के मध्यप्रदेश हेड श्री ब्रजेश राजपूत जो कि मुझे भ्रातवत अपनत्व प्रदान करते हैं के  सन्दर्भ से मायाजी की ओर से विमोचन का निमंत्रण आया लेकिन शासकीय व्यस्तताओं के कारण मैं विमोचन में शामिल नहीं हो सका। बघुवार के एक प्रिय स्नेही ने मायाजी की किताब मुझे दी। पुस्तक की समीक्षा आपके समक्ष प्रस्तुत है।

एक छोटे से भारतीय गांव से अमेरिका का सफ़र किसी भी भारतीय महिला के लिये आज भी दिवास्वप्न के समान है। लेकिन मायाजी जो की इस पुस्तक की लेखिका ने अपने अदम्य साहस एवं जिजीविषा से इस स्वप्न को साकार किया। सुन्दर स्वप्न सब देखते हैं लेकिन उन सपनों को साकार करने में धरातल की कठोर सच्चाईयों,दुरूह संघर्षों एवं टूटते फिसलते प्रयासों को जो जीता है वही सपनों का सौदागर बन पाता है।

साईंखेड़ा जो की दादा धूनी वालों की कर्मभूमि के कारण विख्यात है के पास एक छोटे से गांव 'मेहरागांव 'से एक दुबली पतली साधारण सी दिखने वाली सांवली लड़की ऐसे ही संघर्षों को जी कर विश्वपटल पर स्थापित हुई है।

पुस्तक 'बघुवार-स्वराज मुमकिन है' के आमुख में ही मायाजी ने अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि एवं अपने उदेश्य को स्पष्ट किया है। किस तरह अमेरिका में अपने काम से धाक ज़माने वाली भारतीय महिला जब अपने गांव आती है तो बचपन की सहेलियों एवं गांव की गलियों में अमेरिका की सारी चकाचौंध को निछावर कर देती है।

लेखिका को जब 'गांधी पीस फाउंडेशन'के श्री एस.एन.सुब्बा राव जी से मिलने का मौका मिलता है। श्री एस.एन.सुब्बा राव  लेखिका से कहते हैं "नरसिंहपुर में एक सुन्दर स्वच्छ गांव है बघुवार जिसे राष्ट्रपति पुरुष्कार मिला है ,तुम तो गई होगी न ?" इस पर अपनी अनभिज्ञता को लेखिका ने शर्म के साथ प्रकट किया है। लेखिका के मन में  एक जिज्ञासा थी की अमेरिका की पूरी जानकारी रखने वाली नरसिंहपुर कि निवासी होने के नाते उसे इस गांव के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए थी। अतः उन्होंने निश्चय किया कि बघुवार के ऊपर एक डाक्यूमेंट्री के साथ एक पुस्तक भी लिखी जानी चाहिए।

भारतीय ग्रामीण संस्कृति जीन में होने के कारण अत्याधुनिक अमेरिका की ग्लैमरस संस्कृति लेखिका के संस्कारों एवं विचारों को नहीं बदलसकी। पूरी पुस्तक भारत के ग्रामीण परिवेश को उसके  उच्चतम शिखर तक प्रतिपादित एवं परिभाषित करती हुई प्रतीत होती है।

विषय के अनुकूल लेखिका ने सामाजिक एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि में पंचायती राज्य की महत्ता को उभारने की भरपूर कोशिश की है।बघुवार ग्राम की अन्नाजी के रालेगांव सिद्धि से तुलना उत्कृष्ट है। ये दोनों गांव भारतीय पंचायती राज्य व्यवस्था के उत्कृष्ट नमूने बन सकते हैं। पंचायती राज्य व्यवस्था के सफल मॉडल के रूप में इन गांवों को प्रस्तुत करने की लेखिका की कोशिश अप्रतिम है एवं इसको सराहा जाना चाहिए।

पुस्तक की सबसे कमजोर कड़ी भाषा का ग्रामीण परिवेश को प्रकट न कर पाना है। अगर लेखिका कुछ ग्रामीण भाषा का समावेश कर स्थितियों का  चित्रण करती तो निष्चय ही पुस्तक को और रोचक बना सकतीं थीं। इसका मुख्य कारण लेखिका का विज्ञान विषय का स्कॉलर  होना है। मायाजी की पुस्तक का विषय सिर्फ एक गांव के आचरण और उसके पंचायती राज्य की व्यवस्थाओं को परिभाषित करना था इस कारण भी लेखिका को भाषा के परिमार्जन का अवसर नहीं मिला।  बघुवार ग्राम के परिचय में लेखिका ने उसे बुंदेल खण्ड का एक गांव निरुपित किया है जबकि ये क्षेत्र महाकौशल यानि गोंडवाना के अंतर्गत आता है। इस अनभिज्ञता का मुख्य कारण बरमान में नर्मदा के उसपार से बुंदेलखंड का लगा होना है।

ग्रामीण भारत विकास के नए आयाम कैसे पा सकता है एवं ग्रामीण भारत के विकास में पंचायती राज्य की क्या भूमिका हो सकती है ?यह पुस्तक इन समस्त प्रश्नों को आवाज देने में सफल रही है। समस्त विसंगतियों एवं तमाम विरूपताओं के वावजूद भारतीय ग्रामीण परिवेश विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है इसका निराकरण करने में भी लेखिका सफल रही है। इस पुस्तक के माध्यम से नए विचार ,बोध एवं नई संकल्पनाओं ने जन्म लिया है। मायाजी की भाषा एवं भावों में एक नवीन शैली की दस्तक है जो नव सृजन को नई पहचान दिलाने की अपनी यात्रा को जारी रखती है।

ग्रामीण परिवेश को विकास का पर्याय बनती ये पुस्तक माया जी का एक सराहनीय प्रयास है इसके लिए वो बधाई की पात्र हैं।



पुस्तक समीक्षा

बघुवार-स्वराज मुमकिन है।

लेखिका -माया विश्वकर्मा

प्रकाशक -सुकर्मा फाउंडेशन 109 ,मेहरा गांव ,गाडरवारा

संस्करण -प्रथम (अप्रेल 2016)

मूल्य -पेपरबैक 195 /-


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