पौरूषत्व

03 जून 2016   |  विष्णु द्विवेदी   (153 बार पढ़ा जा चुका है)

उसका दुनिया में आना आसान नहीं था
अगर वो आ गई
जब तक वह बच्ची थी परेशानियां कुछ कम थी
ज्यों रजोदर्शन हुआ परेशानियां और शुरु हुईं
हालांकि तब भी वह बच्ची थी
तुमने नियम बनाए रजस्वला के लिए यह सही
नियम बनाना गलत तो नहीं 
इन नियमों को सही सिद्ध करने को शायद तुमने दिए होंगे कारण 
क्योंकि नियम अनुसरित नहीं किए जाते अकारण
कहा होगा तुमने इससे रजस्वला को मिलेगा आराम
क्या सफाई घर की ,कपड़ों की है शक्ति रहित काम 
और जैसे पूजा अर्चना में लगता हो प्रबल बल
अरे होती है उनकी माहवारी 
क्यों है यह मानसिक समस्या तुम्हारी
नहीं दी अनुमति मंदिर मे कह कर 
कि देह में उनकी गंदगी है रज की
फिर क्यों नहीं दिखता है वह दूषण 
जब चिपक जाते हो उस हाल में उनसे प्रणय के लिए
है इच्छा यही तुम्हारी
कि पूरी हो इच्छा तुम्हारी 
दूजे की इच्छा और कष्टों से
नहीं है कोई सरोकार तुम्हारा
नहीं बदलोगे तुम
क्योंकि इसी को तुम पौरूषत्व कहते हो

कहते हो तुम 
यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता
क्या खूब कहा है तुमने
बस कहा है तुमने
गालियां भी बनाई तुमने नारी की
मां या बहन की गाली देकर बताते हो तुम 
कितना समझा है तुमने इन रिश्तों  और इन शब्दों की मर्यादा को
क्या यही पौरूषत्व है ?

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