इज्जत

06 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (179 बार पढ़ा जा चुका है)

बरसात के मौसम में सड़क के खड्डो से गुजरती बस, धचके खाती चली जा रही थी. सीटों पर बैठे बूढ़े, बच्चे और अन्य यात्री धक्के खाते एक - दूसरे पर गिर रहे थे. उन्ही के बीच, दोनों सीटों के मध्य, एक युवती नीचे

गठरी पर बैठी थी. शरीर पर मैले - कुचैले कपड़े और हाथों में एक 7-8 महीने का बालक था. उसी के पास एक वर्दी वाला खड़ा था, जो

बस के धचको से अपना हाथ युवती पर फेर देता. युवती ने सम्भल कर अपने शरीर को बचाये रखा, लेकिन जब हाथ ज़्यादा नीचे गया तो युवती इसका विरोध किया. बस के सभी यात्रियों की नज़र उन पर

आ टिकी. वर्दी वाले ने शर्म से अपनी इज्जत बचाते हुए युवती के थप्पड़ मारा और  अगले स्टैंड पर बस रोक उसे नीचे उतार लिया. अगले दिन स्थानीय समाचार पत्र में एक छोटी सी खबर छपी थी. बस में जेब तराशते युवती पकड़ी. वर्दी वाले ने खूबसूरती से अपनी इज्जत बचा ली थी.  

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सृष्टि
07 जून 2016

सामाजिक सोच वाली कहानी

ठीक कहा आपने योगिता जी ....... मेरी ये कहानी से यदि मै 1 भी ऐसी घटना को रोक सका तो मै अपने आप को खुशकिस्मत समझुंगा

समय पर अगर सभी बस यात्रियों ने उस महिला का साथ दिया होता तो शायद खबर कुछ और होती और इस तरह की हरकत करने वालों को सबक भी पर न जाने इन सब को देख कर भी अंजान बने रहना कहीं न कहीं हमारी ही गलतियों को दर्शाता है ... इस लिए ऐसी घटनाओं का विरोद करना सीखना होगा | धन्यवाद

keshav jain
06 जून 2016

kya baat h

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आतंकवाद की गोली, हमारा खुदका बोया भ्रष्टाचार, घोटालों और बेईमानी का बीज जिस भारत में पनप रहा है, क्या आम आदमी ने ऐसा ही लोकतंत्र चाहा था? क्या जिन लक्ष्यों, उम्मीदों व सपनों को आजादी के नाम पर संजोया था उसका कुछ हिस्सा भी आम आदमी तक पहुँच पाया है? यहां साहूकार, जमीदार, और बड़े व्यापारी जरूर फले फूले 
17 जून 2016
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फि
जिस देश में बेटियां बिकने पर मजबूर हों और बेटे घर परिवार की सुरक्षा के लिए कलम की बजाय बंदूक पकड़ने को मजबूर हो जाएँ, तो ऐसी आजादी बेमानी होने की बात मन में उठना स्वभाविक है. बाजार हो या ट्रेन, या बस हो, कब छुपाकर रखा बम फट जाये, इस दहशत में आजाद भारत में जीना पड़े तो इसे विडंबना ही कहा जायेगा. जहाँ ए
14 जून 2016
09 जून 2016
जीवन में सफलता तो आवश्यक है ही लेकिन यह भी आश्यक है कि आप जीवन से संतुष्ट एवं प्रसन्न रहें. धन और शोहरत तो जरूरी है लेकिन उनके पीछे भागते रहने से मौजूदा जीवन पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ना चाहिये. अक्सर लोग परेशान रहते है कि जीवन में सुख नहीं है, लेकिन यह सुख दरअसल आपके हाथ में ही है. बस आपको पहचानना है 
09 जून 2016
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