कविता - नई गंगा बहा दूंगा मैं

08 जून 2016   |  राम लखारा   (166 बार पढ़ा जा चुका है)

कविता - नई गंगा बहा दूंगा मैं

कर्म साधना का साधक चिर, 

रत सदैव इस जीवन तप में 

मनु दृढ प्रतिज्ञ, अभिलाषी, 

मन विजेता मन का नृप मैं 


भीषण घाव सहन करूं पर

वंचित पथ से क्यों हो जांऊ 

मिथ्या दामन थाम चलूं क्यों 

विमुख सत्य से क्यों हो जांऊ  


पुत्र पराक्रमीं उस मनु का 

किंचित हार ना मान सकता 

ऐसा भी क्या रहस गूढ है 

जिसकों मैं नहीं जान सकता 


सब पौरुष संचित भुजबल में 

सब ज्ञान छिपा है मस्तिक में 

हां अभी मैं पथ पर चला हूं 

पहुंच जाऊंगा ध्येय दिक में  


उम्मीद सदा उन्नत रहती  

सदृश हिमालयीें उच्च श्रृंग 

मम भारी भाव भरा अंतस 

मम कर्म बसा तन अंग अंग 


विगत विकट पराजये सारी 

एक साथ बिसरा दूंगा मैं 

धीर प्रवीर कर्मठ भगिरथ 

नई गंगा बहा दूंगा मैं।               - राम लखारा विपुल


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विगत विकट पराजये सारी ...एक साथ बिसरा दूंगा मैं ...धीर प्रवीर कर्मठ भगिरथ ...नई गंगा बहा दूंगा मैं। -- वाह बहुत ही उम्दा और सारगर्भित रचना. शब्दों का नायब चित्रण ...बधाई हो !1

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