भूखा बचपन

09 जून 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (624 बार पढ़ा जा चुका है)



रोटी की सही कीमत जानता है ,

भूख से बिलबिलाता बदहाल बेसहारा बच्चा ,
ढूंढ रहा है जो होटल के पास पड़ी झूठन में रोटी के चन्द टुकड़े,
जिन्हें खाकर बुझा सके वो अपने उदर की आग को ,
जिसकी तपन से झुलस रहा है उसका कोमल, कुपोषित ,कमजोर बदन |


झपट पड़ा था जो फैंकी गयी झूठन पर उस कुते से पहले ,
जो रोटी के कुछ टुकड़े कहीं और खाकर चल रहा था उससे आगे |


जलन होती है उस भूखे बेसहारा बच्चे को उस कुते के सौभाग्य से ,
जो बंगले के लॉन में बैठा मजे से करता है, हर सुबह मक्खन लगी रोटी का नाश्ता |


सोचता है वह भूख से बेहाल बच्चा कि वह यदि किसी बंगले का कुता होता,
तो वह भी खाता भरपेट मक्खन लगी रोटी ,
और नहीं भटकता यूँ जुगाड़ने को रोटी |


बीनता है बेचारा बच्चा, सड़ांध मारते घूरे पर पड़ा कचरा, ढूँढने को ऐसी कोई वस्तु ,
जिसे बेच कर वो पा सके कुछ पैसे और खरीद सके रोटी ,
भरने को पीठ से चिपके उस पापी पेट को, जो ढंग से कभी पूरा भरा ही नहीं |


अधभूखा सोने को मजबूर वह बच्चा, रोज देखता है एक ही सपना ,
हाथ में पकड़ी भोजन भरी थाली का |


पर अभागा सपने में भी रह जाता है अधभूखा |


खा चुकता है जब वो सपने में ,
नरम -गरम ,हल्की-फुल्की,गोल -मटोल ,चिकनी -चुपड़ी ,फूली -पतली
मक्खन लगी स्वादिष्ट पहली रोटी ,
तब भाग जाता है छीन कर थाली ,
दो पैरों पर चलनेवाला कोई भयानक प्राणी |


इस पर एक चीख के साथ टूट जता है उसका सपना
और भूखा बचपन सहला कर रह जाता है, चिपका पेट अपना |


*********************************************************

भूख से बेहाल, बेसहारा, गरीब बच्चे की दारुण दशा का कारुणिक चित्रण प्रस्तुत करती कविता

अगला लेख: अनमोल आजादी



रवि कुमार
05 जनवरी 2017

कविता जी , किसी पत्थर को पिघलाने के लिए काफी है ये कविता . जितनी भी तारीफ करूँ कम है

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
01 जून 2016
कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियजैसी हो वैसी चली आओअब शृंगार रहने दो|अगर  माँग हे सीधीया फिर जुल्फे है उल्झीना करो जतन इतनासमय जाए लगे सुलझीदौड़ी चली आओ तुम,ज़ुल्फो को बिखरा रहने दोजैसी हो वैसी चली आओअब शृंगार रहने दो|कुछ सोई नही तुमआधी जागी चली आओसुनकर मेरी आवाज़ऐसे भागी चली आओजल्दी मे अगर छूटे कोई गहना,या
01 जून 2016
15 जून 2016
सृष्टि और समाज की कमियों व विसंगतियों पर कटाक्षकरती हास्य कविता -@@@-अनूठा सपना-@@@*********************************************************झूठ -कपट और बेईमानी देख ,मैं बहुत उदास था |भ्रष्टाचार भरा संसार मुझको ,आया नहीं रास था ||उड़ जाते हैं बाल सर के ,पर बेकार बाल तंग करते |ढल जाता तन बुढ़ापे में ,वै
15 जून 2016
18 जून 2016
@@@@@@@-अनमोल आजादी -@@@@@@@************************************************************सन अठारह सौ सतावन का .वो वक्त बहुत अनूठा था |जन -विद्रोह का ज्वालामुखी ,जब भारत में फूटा था ||भारतीयों ने अंग्रेजों के संग ,जब खुनी होली खेली थी |अंग्रेज जिसको ग़दर कहते ,वो आजादी की जंग पहली थी ||सुहागिनों ने सुह
18 जून 2016
21 जून 2016
@@@@@@@@@@@@@ बहू से बन गयी बेटी @@@@@@@@@@@@@************************************************************************************रोज सुबह घूमने जाने वाले सम्पत जी आज अभी तक सो रहे थे | उनकी बहू ने यह सोचा कि उनकी तबीयत ठीक नही होगी | कमरे की सफाई के दौरान बहू के हाथ से तिपाई पर रखा उनका चश्मा फर्श
21 जून 2016
13 जून 2016
कि
किसान चिंतित हैसुशील शर्माकिसान चिंतित है फसल की प्यास से ।किसान चिंतित है टूटते दरकते विश्वास से।किसान चिंतित है पसीने से तर बतर शरीरों से।किसान चिंतित है जहर बुझी तकरीरों से।किसान चिंतित है खाट पर कराहती माँ की खांसी से ।किसान चिंतित है पेड़ पर लटकती अपनी फांसी से।किसान चिंतित है मंडी में लूटते लुट
13 जून 2016
20 जून 2016
यो
उसका नाम है रामदीन. वह भी ''योगासन'' करना चाहता है पर अभी वह ''भूख-आसन'' का शिकार है. उसे देख कर यह कविता बनी  -भूखे को रोटी भी दे दो,फिर सिखलाना योग .बड़ा रोग है एक गरीबी, चलो भगाएं रोग.खा-पीकर कुछ अघा गए हैं, अब सेहत की चिंता जो भूखे हैं उन लोगो को कौन यहां पर गिनता। पहले महंगाई से निबटो, भ्रष्टाचा
20 जून 2016
15 जून 2016
ला
@लाज है नारी का गहना,इसका मत व्यापार करो@*******************************************************नारी जिस्म-फ़रोशी का , बन्द यह बाजार करो ।लाज है नारी का गहना,इसका मत व्यापार करो ॥नारी के जिन उरोजों पर,शिशुओं का होता है अधिकार।मिलती है जिनसे उनको , उज्ज्वल पावन जीवन-धार॥सरे आम उघाड़ कर उनको , न उन पे
15 जून 2016
17 जून 2016
@@@@@@@@ नकारे नेता @@@@@@@@***************************************************पाचन शक्ति इनकी देख कर ,लगता ये इन्सान नहीं हैं |चारा,कोयला ,खाद यूरिया , इन्सानों का खान नहीं हैं ||इनके बयानों को सुनकर ,लगता इनको ज्ञान नहीं है |हक़ की बातें करते सारे ,कर्त्तव्य की पहचान नहीं है ||कायरता इनकी देख कर ,ल
17 जून 2016
09 जून 2016
वि
हवाई सफ़र ने दुनिया को ,बहुत छोटा कर दिया |आराम दिया विज्ञान ने ,पर सुकून सारा हर लिया ||दूरियां पार कर ली हमने ,सात समंदर पार की |पर दूर हो गये दिल हमारे ,क्या बात करें संसार की||छोटी हो गयी दुनिया अपनी ,पर फ़ैल गये शहर विकराल |मोबाईल का ज़माना आया ,फैला अजब अंतर जाल ||अजनबी अब फेसफ्रेण्ड है ,पर नहीं
09 जून 2016
13 जून 2016
भु
पप्पू बुरी तरह घबरा गया था, हड़बड़ी मैं किसी और का आर्डर मिस्टर बवेजा को दे आया था, बवेजा का गुस्सा वो पहले देख चुका था, नमक कम होने पर ही वो कई बार खाना फ़ेंक चुका था, कंपकंपाता वो डाबा मालिक रामलाल के पीछे जाकर खड़ा हो गया, राम लाल ने उसे इसतरह खड़ा देखा तो डाँटते हुए बोला अबे ओये पप्या यहाँ खड़ा-खड़
13 जून 2016
23 जून 2016
@@@@ अन्धविश्वास का अन्धेरा @@@@**************************************************दुर्घटना में पलट गयी थी ,एक मारुती कार |उस काली कार में , मेरा साथी था सवार ||साथी के एक हाथ में ,गहरी चोट थी आयी |पास के हॉस्पिटल से उसने,पट्टी थी करवायी ||शाम को वो साथी घर पर,प्रसाद लेकर आया |और दुर्घटना में बच जाने
23 जून 2016
01 जून 2016
कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियअब इन राहो पर सफ़र आसान लगता हैजो गुमनाम है कही वही पहचान लगता है||जिस शहर मे तुम्हारे साथ उम्रे गुज़ारी थीकुछ दिन से मुझको ये अनजान लगता है||कपड़ो से दूर से उसकी अमीरी झलकती हैमगर चेहरे से वो भी बड़ा परेशान लगता है||मुझको देख कर भी तू अनदेखा मत करतेरा मुस्करा देना भी अब एहसान
01 जून 2016
09 जून 2016
लू
रिश्वत खोरी पर व्यंग करती कविता -लूट की छूट लूट कर यात्रियों को लूटेरों ने ,लौटा दिया सारा धन -माल |सोचने लगे यात्री सारे ,क्या है यह कोई इनकी चाल ?|डर रहे थे सब यात्री ,पर एक बालक बोला करते खाज |डाकू सर प्लीज बताओ , इस दया का क्या है राज ?|डाकू बोला ,यह दया नहीं है ,यह है रिश्वत का सवाल |हर लूट पर
09 जून 2016
22 जून 2016
@@@@@@@@@गलती @@@@@@@@@****************************************************इन्सान है गलती का पुतला ,गलती इन्सान से होती है |इन्सान की पैदाइश भी तो ,'गलती' से ही होती है ||होती नहीं अगर गलती तो ,इन्सान धरती पर नहीं आता |आता भी अगर कहीं तो , शीघ्र मुक्ति पा जाता ||आम इन्सान हर मोड़ पर, गलती करता जाता ह
22 जून 2016
23 जून 2016
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@न बढा नजदीकियाँ इतनी,कि वे दूरियों का आधार बन जाएँ |कस न तू वीणा के तार इतने,कि वे उसके टूटे तार बन जाएँ ||सन्तुलन ही है जिन्दगी , बच अतियों से ओ भोले इन्सान ,मनाएँ अगर तू सलीके से , तो रूठा तेरा हर यार मन जाए ||@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
23 जून 2016
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x