भूखा बचपन

09 जून 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (540 बार पढ़ा जा चुका है)



रोटी की सही कीमत जानता है ,

भूख से बिलबिलाता बदहाल बेसहारा बच्चा ,
ढूंढ रहा है जो होटल के पास पड़ी झूठन में रोटी के चन्द टुकड़े,
जिन्हें खाकर बुझा सके वो अपने उदर की आग को ,
जिसकी तपन से झुलस रहा है उसका कोमल, कुपोषित ,कमजोर बदन |


झपट पड़ा था जो फैंकी गयी झूठन पर उस कुते से पहले ,
जो रोटी के कुछ टुकड़े कहीं और खाकर चल रहा था उससे आगे |


जलन होती है उस भूखे बेसहारा बच्चे को उस कुते के सौभाग्य से ,
जो बंगले के लॉन में बैठा मजे से करता है, हर सुबह मक्खन लगी रोटी का नाश्ता |


सोचता है वह भूख से बेहाल बच्चा कि वह यदि किसी बंगले का कुता होता,
तो वह भी खाता भरपेट मक्खन लगी रोटी ,
और नहीं भटकता यूँ जुगाड़ने को रोटी |


बीनता है बेचारा बच्चा, सड़ांध मारते घूरे पर पड़ा कचरा, ढूँढने को ऐसी कोई वस्तु ,
जिसे बेच कर वो पा सके कुछ पैसे और खरीद सके रोटी ,
भरने को पीठ से चिपके उस पापी पेट को, जो ढंग से कभी पूरा भरा ही नहीं |


अधभूखा सोने को मजबूर वह बच्चा, रोज देखता है एक ही सपना ,
हाथ में पकड़ी भोजन भरी थाली का |


पर अभागा सपने में भी रह जाता है अधभूखा |


खा चुकता है जब वो सपने में ,
नरम -गरम ,हल्की-फुल्की,गोल -मटोल ,चिकनी -चुपड़ी ,फूली -पतली
मक्खन लगी स्वादिष्ट पहली रोटी ,
तब भाग जाता है छीन कर थाली ,
दो पैरों पर चलनेवाला कोई भयानक प्राणी |


इस पर एक चीख के साथ टूट जता है उसका सपना
और भूखा बचपन सहला कर रह जाता है, चिपका पेट अपना |


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भूख से बेहाल, बेसहारा, गरीब बच्चे की दारुण दशा का कारुणिक चित्रण प्रस्तुत करती कविता

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