सत्य एवं प्रेरणादायी

09 जून 2016   |  देवेन्द्र प्रसाद   (167 बार पढ़ा जा चुका है)

पितामह भीष्म के जीवन का एक ही पाप था कि उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया।
और
जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था कि उसने समय पर क्रोध किया।

परिणामस्वरुप,
एक को बाणों की शैय्या मिली,
और
एक को प्रभु श्रीराम की गोद!

अतः क्रोध भी तब पुण्य बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए, और सहनशीलता भी तब पाप बन जाती है जब वह धर्म और मर्यादा को बचा ना पाये। 🙏 🚩 जय जय श्री राम🚩🙏

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