विज्ञापन विज्ञान - व्यंग्य ‬

10 जून 2016   |  राम लखारा   (895 बार पढ़ा जा चुका है)

यह विज्ञापनों का देश था।

कुछ विज्ञापन देकर कमाते थे, कुछ लेकर।

गली, मोहल्ले, बाजार, स्कूल, पेड़, पौधे, सार्वजनिक सुविधा घर यहां तक कि दूसरों की फेसबुक दीवार और रोटी पर तक लोग विज्ञापन लगाने से नहीं चूकते थे। 

जो लोग विज्ञापन नहीं लगवाना चाहते थे वे भी अपनी दीवारों पर विज्ञापन देकर लिखते थे कि यहां विज्ञापन लगाना मना है। 

यहां विज्ञापनों के दम पर संन्यासी राजनीति, राजनेता अभिनय, अभिनेता व्यापार, व्यापारी लूट और लूटेरे भक्ति करते थे।

विज्ञापन लगाने के लिए जो बात उन्हें सबसे अधिक प्रेरित करती थी वह थी- 

यहां विज्ञापन लगाना मना है, जुर्माना 500/- (जो कभी लिया नहीं जाता था )।

‪#‎विज्ञापन_विज्ञान‬


                                                       - राम लखारा 'विपुल' 

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sunita
10 जून 2016

😁

शुक्रिया जी

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