बेटी बोझ नहीं

10 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (306 बार पढ़ा जा चुका है)

पिताजी की मृत्यु को एक महीना ही हुआ था. शान्तनु के सिर पर ही बहिन की शादी और घर की जिम्मेदारी का बोझ आ

गया.  पिताजी की बीमारी में भी बहुत खर्च हो चुका था. घर के हालात को माँ समझती थी, लेकिन बेबस थी, फिर शान्तनु के भी तो दो लड़कियाँ थी, जिनको पढ़ाना - लिखाना और उनके ब्याह के लिए भी कुछ जोडना. सब कुछ देखकर घबरा गया शान्तनु और चिड़चिड़ाने लगा.

उस दिन ऑफिस जाने से पहले माँ से कह रहा था, अब मै क्या करुँ. माँ और बहिन को दोषी साबित कर झगड़ रहा था, कहाँ से करुँ इसका ब्याह. मेरे स्वयं के भी दो लड़कियाँ है. पिताजी ने जो रुपया जोड़ा था, उन्ही की बीमारी में सब ख़त्म हो चुका है. माँ और बहिन दोनों निगाहें झुकाये सब सुन रही थी, कि द्वार पर डाकिया बहिन कि IAS में सफलता का फरमान दे गया. माँ और बहिन की आँखों में जीत की ख़ुशी दौड़ने लगी और शान्तनु निशब्द सा

खड़ा सोच रहा था, पिताजी जाने से पहले ही पढ़ा - लिखा कर अपनी बेटी को इस काबिल बना गए कि उनके जाने के बाद भी वो किसी पर बोझ न बने.

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