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सुंदर पिचाई पर कोई क्यों नहीं बनाता फिल्म

11 जून 2016   |  tarkeshkumarojha

८० के दशक में एक फिल्म आई थी..  लव मैरिज।  किशोर उम्र में देखी गई इस फिल्म के अत्यंत साधारण होने के बावजूद इस फिल्म का मेरे जीवन में विशेष महत्व था। क्योंकि फिल्म के एक दृश्य में चरित्र अभिनेता चंद्रशेखर दुबे मेरे शहर खड़गपुर का नाम लेते हैं। इस फ्लिम के एक सीन से  मेैं कई दिनों तक रोमांचित रहा था। पैसों की तंगी और परिजनों की डांट -फटकार की परवाह किए बगैर मैने यह फिल्म केवल अपने शहर का नाम सुनने के लिए कई बार देखी थी। क्योंकि इससे मुझे बड़ा सुखद अहसास होता था। वैसे मैने सुन रथा कि  महान फिल्म  निदेशक स्व. सत्यजीत रे समेत कुछ बांग्ला फिल्मों में खड़गपुर के दृश्य फिल्माए जा चुके हैं। लेकिन तब मैने सोचा भी नहीं था कि कालांतर में मेरे शहर को केंद्र कर कोई फिल्म बनेगी और उसकी यहां शूटिंग भी लगातार कई दिनों तक चलेगी। भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे सफलतम कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी पर बन रही फिल्म की शूटिंग देश हजारों शहरवासियों के साथ मुझे भी सुखद आश्चयॆ हुआ। बेशक उस कालखंड का गवाह होने की वजह से मैं मानता हूं कि धौनी की फशॆ से अशॆ तक पहुंचने की कहानी बिल्कुल किसी परीकथा की तरह है। कहां लेबर टाउन कहा जाने वाला खड़गपुर जैसा छोटा सा कस्बाऔर कहां  और कहां क्रिकेट की जगमगाती दुनिया। एक नवोदित खिलाड़ी के तौर पर उनका शहर आना और कुछ साल के संघषॆ के बाद भारतीय टीम में चयन के साथ सफलता के शिखर तक पहुंचने का घटनाक्रम काफी हैरतअंगेज है। जिसकी वजह से धौैनी व्यक्ति से ऊपर उठ कर एक परिघटना बन चुके हैं। उन पर बन रही फिल्म के बहाने जीवन में पहली बार किसी फिल्म का शूटिंग देख मेरे मन में मुख्य रूप से दो सवाल उठे। पहला यह कि किसी फिल्म को बनाने में बेहिसाब धन खचॆ होता है। इतना ज्यादा जिसकी कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता। दूसरा यह कि हमारे देश में राजनीति , फिल्म और क्रिकेट के सितारे ही रातोंरात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंच कर वह सब हासिल करने में सॐम है जिसकी दूसरे ॐेॊ के संघषॆशील लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। मेरे मन में अक्सर सवाल उठता है कि क्या वजह रही कि मेरे शहर के वे तमाम खिलाड़ी हमेशा उपेॐित ही रहे जो अपने -अपने खेल के धौनी हैं। िक्रकेट की बदौलत देखते ही देखते जीवंत किवंदती बन गए धौनी के आश्चयॆ जनक उड़ान पर हैरान होते हुए मैं अक्सर सोच में पड़ जाता हूं कि यदि बात सफलता की ही है तो उन सुंदर पिचाई पर कोई फिल्म बनाने की क्यों नहीं सोचता जो इसी शहर के आइआइटी से पढ़ कर आज इस मुकाम तक  पहुंचे हैं। जबकि उनकी उपलब्धि का दायरा कहीं अधिक व्यापक है। बेशक किसी की उपलब्धि को कम करके आंकना मेरा मकसद नहीं। लेकिन यह सच है कि देश के लिए खेलने के बावजूद एक खिलाड़ी की उपलब्धियां काफी हद तक व्यक्तिगत ही होती है। जबकि इंटरनेट जैसे वरदान ने अाज छोटे -बड़े और अमीर -गरीब को एक धरातल पर लाने का कायॆ किया है। आइआइटी कैंपस जाने का मौका मिलने पर मैं अक्सर ख्यालों में डूब जाता हूं कि इसी शहर में रहते हुए सुंदर पिचाई जैसे आइआइटीयंस ने पढ़ाई पूरी की होगी। जीवन के कई साल उन्होंने इसी शहर में गुजारे होंगे। लेकिन कोई उनकी सफलता को अनटोल्ड स्टोरी के तौर पर रुपहले पदॆे पर उतारने की क्यों नहीं सोचता। हर कोई क्रिकेट खिलाड़ियों को ही   भगवान बनाने पर क्यों तुला है। <br>

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