ठोकरे खाता-बचपन

12 जून 2016   |  अवनीश कुमार मिश्रा   (159 बार पढ़ा जा चुका है)

आज हमारे देश में पहले जैसी बात नही रही हमारे देश का का संविधान है संविधान में बाल श्रम कराने वाले को अपराधी माना जाता है फिर भी हमारे देश में बहुत से आदमी ऐसे हैं जो आज भी बाल श्रम कराते है और उन्हें कानून से तनिक भी ड़र नही लगता |बहुत बच्चे ऐसे भी जो मजबूरी में श्रम करतें है उन्हें न किसी सरकारी योजना का लाभ मिल रहा है न कोई राहत पैक | ऐसा नहीं है कि सरकार ने योजना नही चला रखी है योजनायें बहुत हैं लेकिन उन बच्चों तक नहीं पहुचता जिसको इसकी जरूरत है उन बेचारों के जिन्दगी में न बचपन लिखा है न खेल-कूद उन्हें केवल अपना पेट पालना होता है उनके जिन्दगी से पूँछो की कैसे होता है दुःख जब कोई लड़का पढ़ने जा रहा हो और वह काम पर जा रहा हो |पढ़ने का ललक उनका पानी-पानी हो जाता है |जब कोई उन्हें अनपढ़ कहता है |वह सोचता है कि काश मैंने भी पढ़ा होता लेकिन कैसे मुझे तो जीवनभर मजदूरी ही करनी मेरे किस्मत में पढ़ाई-लिखाई नही है इस तरह की सोच उन्हें अवसाद ग्रस्त बना देती है और कुछ बच्चे आगे चलकर अपराधी प्रवृति के हो जाते हैं उनका विश्वास कानून आैर सरकार सभी से टूट जाता है और वे उनके खिलाफ रहने लगते हैं तो बचपन इस तरह बरबाद होतें है कि बच्चे अपने आप से भी घृणा करने लगतें हैं
अगर ऐसा ही रहा तो अगले एक दशक में हर गली में सौ-दो सौ बच्चो का ठोकर खाता बचपन मिलेगा |सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए इस पर और स्वयंसेवी संगठनों को भी इस पर आन्दोलन चलाने चाहिए||

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