कुर्सी का खेल (व्यंग)

13 जून 2016   |  अवनीश कुमार मिश्रा   (534 बार पढ़ा जा चुका है)

चाहे भोजन करने के लिए कुर्सियों का जंग हो या नेताओं के बीच सत्ता का लेकिन कुर्सी का खेल बड़ा ही निराला है कोई मेज के लिए झगड़ा क्यों नहीं करते क्या खास बात है कुर्सी में इसे तो ऐसे ही समझ लेना चाहिए कि आज से ही मोदी क्यों इलाहाबाद जाकर अपनी कुर्सी पक्का करने में जुट गयें हैं |ये दूसरो को बेकार और अपने आप को अच्छा कहने में तनिक नहीं हिचक रहे हैं ये भी नहीं जानते कि मैंने काम क्या किया है २साल जनता को मजबूत चूतिया बनाया फिर आ गया हूँ
कुर्सी की गर्मी इसी से जान लीजिए कि एसी. के तरावट में रहने वाले नेता जी इस गर्मी में कहाँ से आ गये कहीं झाईंया निकल आयी तो क्या होगा |अरे होगा क्या बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी है न क्रीम मंगवा लेंगे किसी ने कहा जनता क्या करेगी नेता झट से बोल उठे जाकर सरसों का उबटन लगायें
तब पता चला कि आखिर कुर्सी की गर्मी क्या होती है||

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