फिर खतरे में आजादी

14 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (454 बार पढ़ा जा चुका है)

जिस देश में बेटियां बिकने पर मजबूर हों और बेटे घर परिवार की सुरक्षा के लिए कलम की बजाय बंदूक पकड़ने को मजबूर हो जाएँ, तो ऐसी आजादी बेमानी होने की बात मन में उठना स्वभाविक है. बाजार हो या ट्रेन, या बस हो, कब छुपाकर रखा बम फट जाये, इस दहशत में आजाद भारत में जीना पड़े तो इसे विडंबना ही कहा जायेगा. जहाँ एक के बाद एक नये राज्यों

का गठन कहीं न कहीं आंतरिक विभाजन के बीज बो रहा है, जहाँ भाषा और क्षेत्र के आधार देश के टुकड़े हो रहे हैं, 

ऐसे में देश की आजादी एक छलावा सिद्ध होती है. आजाद भारत में अब एक नया जहर आरक्षण और फैल गया है. 

अधिकांश जातियां आरक्षण मांगने लगी है. राजनितिक दबाववश यदि ऐसी जातियों को आरक्षण दिया जाता है, 

जो इसके काबिल नहीं तो अनारक्षित वर्ग में असंतोष पनपता है. यदि आरक्षण ना दिया जाये तो हिंसक आंदोलन 

और जातिगत प्रतिद्वंद्विता सामने आती है. यह असंतोष समाज और देश के लिए घातक सिद्ध हो रहा है. कुल मिलाकर यदि समय रहते देश की चिंता ना की गई तो हमारी आजादी फिर खतरे में होगी.

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सही कहा।

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