अनूठा सपना

15 जून 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (93 बार पढ़ा जा चुका है)

सृष्टि और समाज की कमियों व विसंगतियों पर कटाक्ष

करती हास्य कविता -@@@-अनूठा सपना-@@@

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झूठ -कपट और बेईमानी देख ,मैं बहुत उदास था |

भ्रष्टाचार भरा संसार मुझको ,आया नहीं रास था ||
उड़ जाते हैं बाल सर के ,पर बेकार बाल तंग करते |
ढल जाता तन बुढ़ापे में ,वैज्ञानिक बेचारे क्या करते ||
यह सोचते मैं सो गया था ,और आ गयी थी नीन्द गहरी |
रात नहीं थी वो साथियों ,वो तो थी भरी दुपहरी ||
बन गया साथियों मैं सपने में ,सर्वेसर्वा पूरी सृष्टि का |
पूर्ण परिवर्तन कर डाला मैंने ,मानव की अन्तर दृष्टि का ||
दिमाग के कंप्यूटर का ,सॉफ्ट वेयर बदल डाला |
गलत सोचना और झूठ बोलना ,इस तरकीब से था टाला ||
ब्रेन -वाश करके मैंने ,दिमाग निर्मल कर दिया |
अच्छी सोच रखने वाला ,प्रोग्राम उसमें भर दिया ||
चमत्कार हो गया सारे जग में ,दुर्जन सज्जन बन गये |
रूठे थे जो एक दूजे से ,वे बिन मनाये मन गये ||
एक दूजे के जानी दुश्मन ,दुश्मनी अपनी भूल गये |
विनम्र हो गये वे अभिमानी ,जो सफलता पाकर फूल गये ||
झगड़े ,टंटे और मारकाट ,गाली-गलौज सब गायब हुए |
जो अब तक नहीं हुए थे ,वो अनूठे चमत्कार सब हुए ||
पचास वर्ष के बाद तन का ,ढलना बिल्कुल बंद हुआ |
आतंकवादी आंतक छोड़ ,पूर्ण अमन पसन्द हुआ ||
सिर के बालों की खेती ,नहीं कभी सफ़ेद हुई |
खरपतवारी बाल हुए गायब,मानो उनको कैद हुई ||
नारी को माहवारी ने , तंग करना छोड़ दिया |
और हर टूटे रिश्ते को,फिर प्रेम ने जोड़ दिया ||
प्रसव -पीड़ा के कष्ट से, नारी सच में मुक्त हुई |
नर -नारी में भेद-भाव की,भावना से विमुक्त हुई ||
कीट,कीटाणु और मक्खी-मच्छर,सृष्टि से सारे साफ़ हुए |
रोग ,हादसे और अकाल मृत्यु के , दण्ड सारे माफ़ हुए ||
खरपतवार ने खेती को ,तंग करना छोड़ दिया |
हर अपराधी व्यक्ति ने, जीवन अपना मोड़ लिया ||
सृष्टि को यूँ निर्दोष बना कर,मैं फूल कर कुप्पा हो गया |
और सपने में चादर तान के ,गहरी नीन्द में सो गया ||
इतने में एक मच्छर ने ,मुझे जोर से काट लिया |
और सारा किया कराया मेरा ,उसने पल में पाट दिया ||
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