मै पानी बना नहीं सकता....... बचा सकता हूँ

15 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (322 बार पढ़ा जा चुका है)

कलयुग में किल्लत से घिरा पानी अमृत से कम नहीं 

जिसे बचाना ग्राम से लेकर विश्व स्तर तक जरूरी है. पानी की कमी क्या हुई, मुनाफाखोरों की तो मानो चांदी हो गई. ऐसे में निजी क्षेत्र ने पानी से चांदी कूटने का रास्ता निकाल लिया. करीब हर छोटे गाँव से लेकर शहर में टैंकर का 

पानी नकदी के एवज में उपलब्ध है. बड़े शहरों में पानी की बड़ी बोतलें महँगी दरों पर कॉलोनियों में सप्लाई हो रही है. कई बस स्टैंडों पर तो रेहड़ी पर बड़े मटके लेकर बैठे विक्रेता पाँच- सात रुपये प्रति बोतल लेकर पानी भरते नज़र 

आते है. मुफ़्त में पानी भरने पर होटल वाला अब भौहें चढ़ा लेता है. ऐसे में जल संरक्षण पर विचार मंथन की जरूरत है.  जल संकट की केवल बात करने से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार के साथ ही हर नागरिक को अपने स्तर पर 

जागरुकता लाने और उपाय सुझाने की जिम्मेदारी निभानी होगी. सूखे इलाकों में रेन वाटर   हार्वेस्टिग को एक आदत बनाना होगा. इसके अलावा व्यक्तिगत जीवन में पानी के किफ़ायत से प्रयोग को जीवन शैली बनाना होगा. याद रखिए पानी से पनप रही है यह पृथ्वी और अगर पृथ्वी पर ज़िंदगी को बचाना है तो सबसे पहले पानी को ही बचाना होगा.

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बिल्कुल सही।

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