जो दिखाई देता है, वह भी सत्य नहीं

16 जून 2016   |  देवेन्द्र प्रसाद   (349 बार पढ़ा जा चुका है)



चीन में यह अपनी तरह का अनोखा प्रयोग था। अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ सेना के उच्च अधिकारी भी डा० चू-फुत सेन का यह प्रदर्शन देखने के लिये एकत्रित हुये। डा० चू-फूत-सेन चीन के उन योग्य वैज्ञानिकों में सं हैं, जिनकी प्रतिभा पर विश्वास करके सरकार ने अनेक बन्दियों पर प्रयोग करने की उन्हें खुली छुट दे दी थी।

6 व्यक्तियों को जिनमें तीन महिलायें भी थीं, एक सजे सजाये कमरे में लाया गया। उनके सिर के पिछले हिस्से के थोड़े बाल साफ करके उसमें अत्यन्त पतला पेपर क्लिप जैसा तार जोड़ दिया गया। यह साधारण दीखने वाला तार मस्तिष्क की अनेक नाड़ियों से जोड़ा जा सकता था और उसके नियन्त्रण के लिये मस्तिष्क में एक छोटा-सा रेडियो ट्रांजिस्टर रिसीवर लगाकर तार को उससे जोड़ दिया गया था।

इसके बाद उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुये डा० चू-फूत-सेन ने बताया कि-संसार की जो भी वस्तुएँ हमारे सामने या संपर्क में आती हैं, उनके किसी भी रूप की कल्पना का सम्बन्ध हमारे मस्तिष्क की उन धाराओं से है, जो अपने आप में विलक्षण संवेगों को छिपाये हुये है। मान लीजिये हमारे मस्तिष्क का कोई साहस वाला भाग सक्रिय है तो उस स्थिति में शेर और बाघ तो क्या कोई बम लेकर भी मारने को खड़ा हो तो उसमें भी भय नहीं लगेगा, क्योंकि उस समय भय की कोई कल्पना ही नहीं होगी। उस व्यक्ति के लिये उतने समय के लिये संसार में कहीं भी भय का कोई अस्तित्व ही समझ में नहीं आयेगा। यह जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह मन की रेडियो तरंगों के अनुरूप बनता-बिगड़ता दृश्य मात्र है। वस्तुतः जो कुछ भी सामने है, उसमें से सत्य कुछ भी नहीं है।

अपने कथन की पुष्टि के लिये अब उन्होंने प्रयोग दिखाया। एक छोटा-सा 20 दिन का पिल्ला लाकर उन कैदियों के सामने छोड़ दिया गया। जब तक वे सामान्य स्थिति में थे, कुत्ते को उसी तरह देखते और उसके खेल-कूद को देखकर प्रसन्न होते रहे जैसे सभी अन्य दर्शक, पर इसी बीच डा० चू-फुत-सेन ने उस तार का सम्बन्ध मस्तिष्क की भय वाली नाड़ी से जोड़कर ट्रांजिस्टर चालू कर दिया। विद्युत प्रवाह (करेंट) का एक निश्चित आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) पर दौड़ना हुआ ही था कि उस छोटे से कमरे में तूफान खड़ा हो गया। छहों कैदी शेर-शेर करते हुये चिंघाड़ कर भागे कई तो इतने भयभीत हो गये कि उन्हें तत्काल मूर्छा आ गई। पर जैसे ही उस रेडियो ट्रांजिस्टर को बन्द कर दिया गया, कैदी फिर शांत हो गये और उन्हें कुत्ते के पिल्ले से कोई डर न रहा।

छोटा-सा पिल्ला पहले भी वैसा ही था और बाद में भी पर मन के एक दृष्टिकोण को उच्च आवृत्ति (हायर फ्रीक्वेंसी) पर विकसित कर देने पर वही पिल्ला शेर जैसा भयंकर दिखाई देने लगा इससे साफ स्पष्ट है कि हम जो कुछ भी देखते सुनते हैं, वह किन्हीं अदृश्य किरणों और मानसिक तरंगों का बनता-बिगड़ता छायांकन मात्र हैं। उनमें से सच कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार पर्दे पर विशेष प्रकार की किरणों-मैजिक लैर्न्टन या सिनेमा के सहारे फोटो गिराने से ऐसा लगता है कि सामने जो ड्रामा हो रहा है, वह बिलकुल सच है उसी प्रकार हमें दिखाई देने वाला संसार भी अज्ञात इच्छा-शक्तियों और प्रकाश-आवर्तनों का छाया चित्र मात्र है और वह थोड़ी देर तक रहता है। पर हमारा दृष्टिकोण अल्प-विकसित होने के कारण वही कई वर्षों का-सा जीवन प्रतीत होता है। और उसमें क्रम-बद्धता होने के कारण नाटक-सा दीखता है पर वस्तुतः उसमें सार और कुछ भी नहीं है, यदि कुछ है तो वह ब्रह्म ही है जिसकी प्रेरणा से प्राण झोंकने से इतना सारा क्रियाशील जगत् दृश्य में आता है।

मनुष्य अपनी प्रकृति जिस दिशा में विकसित कर लेता है, उसे वही भाग सत्य दिखाई देने गलता है और शेष सब उससे निस्सार प्रतीत होने लगता है। उदाहरणार्थ चींटी को संसार में केवल मीठे पदार्थों का ही सबसे बड़ा सुख है और वह उसी खोज में लगी रहती है पर सुअर को मल की बहुत अधिक चाह होती है उसे मीठे व्यंजन भी नीरस दीखते हैं। एक बार अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने इच्छा शक्ति पर नियन्त्रण करने का बहुत दिनों तक प्रयोग करने के बाद यह पाया कि किसी एक इच्छा को ही बहुत अधिक बढ़ाकर मनुष्य को ही नहीं उसे मारा तक जा सकता है। उन्होंने चूहों के मस्तिष्क के ‘प्यास वाले भाग को विद्युत शक्ति से बढ़ा दिया फलस्वरूप वे चूहे प्यासे ने होने पर भी इतना पानी पीते गये कि उनका शरीर फूलकर मोटा हो गया। इस स्थिति से उन्हें हटाया नहीं जाता तो चूहे फिर भी पानी बन्द नहीं करते भले ही उनका शरीर फट जाता है। यद्यपि यह स्थिति आने नहीं दी गई। पर वैज्ञानिक विशुद्ध रूप से इस मान्यता पर उतर आये कि मस्तिष्कीय चेतना में होती है, उसके लिये वही अच्छा लगता है वस्तुतः प्रिय-अप्रिय संसार में कुछ है ही नहीं सब अपनी-अपनी इच्छा और वासना का खेल है उसी से संसार का स्वरूप बनता-बिगड़ता और परिवर्तित होता रहता है। चेतनाएँ भी उनके शरीर धारण करने के लिये इसी सिद्धान्त पर काम करती है।

भारतीय दर्शन का आधार ही चेतना की यह सूक्ष्म स्थिति है, उसी पर इतना बड़ आध्यात्मिक इतिहास खड़ा है। एक बार महर्षि वशिष्ठ ने भगवान् राम को इसी तत्त्व का उपदेश देते हुए बताया था-

स्वप्न संकल्प पुरयोनस्प्यिनुभवस्थयोः।

मनागपि यथा रुपं सर्गादो जगस्तथा।

-6।2146।22,

जगत्संविदि जातायामपि जातं न किच्चन।

-3।13।48,

परमाकाशमाशुन्य मच्छमेव व्यवस्थितम्

-3।13।49,

पिंडग्रहो जगत्यस्मिन्विज्ञानाकाशरुपिणि।

मरुनद्याँ जलमिव न सम्भंवति कुत्रचित्॥

-3।15।7,

जाग्रत्स्वप्नसुधु प्सदि परमार्थविदाँ विदाम्।

न विद्यते किचिदपि यथास्थितमवस्थितम्॥

-3।2।146।21,

तस्माद्राम जगत्रासीत्र चास्ति न भविष्यति।

चेतनाकाशमेवाशु कचतीत्थमिवात्मानि॥

-4।2।8,

हे राम! स्वप्न देखते समय और विचार संकल्प करते समय जो चित्र बनते हैं, थोड़ी देर में वह असत्य सिद्ध हो जाते है, उसी प्रकार यह दृश्य जगत् भी असत्य है। जगत् का दृश्य दिखाई देने पर भी कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ है। परम आकाश ही शुद्ध रूप से स्थिति है। स्वप्न और संकल्प में अनुभव होने पर भी पृथ्वी आदि पिण्ड नहीं होते, वैसे ही अनुभव में आने वाला संसार भी शून्य ही है। स्थूलता उसमें कहीं नहीं है केवल मरुस्थल में जल का-सा भ्रम हो रहा है। राम! जगत् न उत्पन्न हुआ है और न होगा चेतना का प्रकाश अपने आप में ही प्रकाशित हो रहा है।

प्रकाश तत्त्व के ज्ञाता वैज्ञानिक भी अब यही बात मानने लगे है। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक जान डाल्टन एक बार एक सार्वजनिक उत्सव में सम्मिलित हुए। अपने लिये उन्होंने गहरे नीले रंग का सूट चुना और उसे ही पहनकर वे उत्सव में सम्मिलित हुये पर वहाँ जब लोगों ने बताया कि आज तो आप गहरे लाल रंग का सूट पहने है तो वे बड़े हैरान हुये। आखिर इतने आदमी झूठ नहीं बोल सकते थे, इसलिये उन्होंने अपनी आँखों की डाक्टरी जाँच कराई। डाक्टरों ने बताया कि दृष्टि-दोष के कारण उनकी रंग पहचानने की क्षमता भी दोषपूर्ण हो गई हैं, अर्थात् उन्हें रंग कुछ के कुछ दिखाई देते है।

बाद में वैज्ञानिकों ने और भी खोजें की ओर बताया कि पशु-पक्षी वस्तुओं को उसी रंग रूप का नहीं देखते जैसे कि मनुष्य देखते हैं, उदाहरणार्थ कुत्ते और बिल्ली की आंखें संसार का रंगहीन देखती है। उन्हें संसार को सभी वस्तुएँ काली, भूरी या सफेद लगती है, भले ही उन्हें लाल, पीले या गहरे हरे रंग के सामने ले जाकर खड़ा कर दो। बन्दर केवल गहरे लाल, हरे और आसमानी रंग को पहचान सकता है। मेंढक किसी भी रंग को नहीं पहचान सकता। मधु-मक्खियों को संसार के सभी रंग एक से ही दिखाई देते हैं। यह सब मस्तिष्क की बनावट का परिणाम है, वस्तुतः इस संसार में जो कुछ है वह सब भ्रम है, माया है-संसार स्वप्न त्यज मोहनिद्रा’ संसार स्वप्न हैं, मोह निद्रा का परित्याग करने वाली रात अक्षरशः सत्य है।

हम दिन में कुल एक सूर्योदय और सूर्यास्त देखते है पर यूरी गागरिन ने अन्तरिक्ष यात्रा से लौटकर बताया कि उन्होंने एक दिन में अठारह सूर्योदय और सूर्यास्त देखे। पृथ्वी को हम किसी भी रंग का नहीं पाते पर बोरमैन एर्ण्डस और लावेल जब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से आगे बढ़े तो उन्होंने बताया पृथ्वी हरी-भरी नखलिस्तान-सी लगती है। वहीं अन्तरिक्ष यात्री जब चन्द्रमा के समीप पहुँच गये तो यही पृथ्वी उनके लिये पीले प्रकाश की एक ऐसी चमकदार वस्तु जैसा पृथ्वीवासियों को चन्द्रमा दिखाई देता हैं। रात के अन्धकार में पृथ्वी का निवासी कुछ देख नहीं सकता पर अंतरिक्षवासी को पृथ्वी में इतना प्रकाश दिखाई देता है, जिससे वह सबसे छोटा टाइप अक्षर को मजे से पढ़ सकता है। यह सब दृष्टि-दोष और अनेक स्थितियों का अलग-अलग अन्तर है। उसमें से सत्य कुछ भी नहीं है। सत्य की पहचान तो ब्राह्मी स्थिति पर पहुँचकर ही यथार्थ रूप में हो सकती है। उस अन्तिम सत्य को प्राप्त किये बिना मनुष्य मिथ्यात्व में ही परिभ्रमण किया करता है।

सूर्य-प्रकाश सफेद रंग का है, किन्तु उसे जब वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में देखते हैं तो वह सात विभिन्न रंगों से बना प्रतीत होती है। यह सभी रंग ही दृश्य प्रकृति को आच्छादित किये हैं, पृथ्वी भी सूर्य की ही एक स्थूल दृश्य प्रकृति है, ऋतु परिवर्तन की क्रिया को हम पृथ्वीवासी बहुत धीरे-धीरे देखते हैं, ज्यादा कड़े पदार्थ जैसे भूमि-खण्ड लोहा, सोना आदि धातुओं के परमाणुओं की हलचल तो दिखाई भी नहीं देती पर यदि हम पृथ्वी में न होकर सूर्य में हो तो पृथ्वी सूर्य से या सूर्य पृथ्वी से अलग नहीं दिखाई देंगे यहाँ को प्रत्येक वस्तु का एक-एक पल का बनता-बिगड़ता स्वरूप सूर्य से बड़े मजे से देखा जा सकता हैं। पृथ्वी में हमारा मस्तिष्क काम करता है और सूर्य में हमारी चेतना इसीलिये यह भारी अन्तर दिखाई देता है। इस सम्बन्ध में हेल्स हाल्टस और मैक्सवेल के अनुसन्धान बड़े उपयोगी और उल्लेखनीय है। इनके अनुसार नेत्र व मस्तिष्क तीन प्रकार के शिरातन्तुओं से जुड़े है, यह शिरातन्तु क्रमशः लाल, हरे और बैगनी रंग की अनुभूति पैदा करते है, इन शिरातन्तुओं की स्थूलता समाप्त करके एक शुभ ज्योति मस्तिष्क से आने दी जाये तो अब जो वस्तु सामने दिखाई पड़ रही है, वह न केवल रंग से अपितु आकृति से भी कुछ और ही दिखाई पड़ रही है, वह न केवल रंग से अपितु आकृति से भी कुछ और ही दिखाई देने लगे। उन्होंने लाल, हरे और बैगनी रंग को प्रक्षेपित लालटेन (मैजिक लैनटर्प) की मदद से सफेद पर्दे पर घटा-बढ़ाकर डालकर दिखाया कि उनको कम या ज्यादा करने से पर्दे की आकृतियाँ कैसी विचित्र-विचित्र बनती-बिगड़ती है।

स्वाद और गन्ध सम्बन्धी पूर्णपेक्षायें भी नितान्त भ्रामक है। 1918 में ए॰ एफ॰ ब्लैक सली नामक एक वैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया उसने वरवीना जाति के कुछ खुशबूदार और गंधहीन गुलाबी फूल रखे। 42 व्यक्तियों को उन्हें सुँघाया गया। इनमें से 6 पुरुष और 4 स्त्रियाँ ही एकमत से फूलों की गन्ध बता सकें, शेष ने कुछ और ही बताया। ब्लैकसली ने बताया दरअसल किसी वस्तु में गन्ध है ही नहीं यह सब उस वस्तु और मनुष्य की शारीरिक स्थिति का तालमेल मात्र हैं, वह कभी एक जैसा ही हो नहीं सकता।

मनुष्य के अनेक योनियाँ में भ्रमण और विकास की मान्यता ऐसी विचित्रताएँ ही करेंगी भले ही उसमें कुछ और समय लगे।,

स्वाद के बारे में भी ठीक यही बात है। 1931 में डा० एल॰ एच॰ स्नेडर ने 100 व्यक्तियों को एक वस्तु चखाई 68 व्यक्तियों ने उसे कछुआ बताया देख उसका कुछ भी स्वाद नहीं बता सके। प्राणि-विज्ञान शास्त्रियों का यहाँ भी वही कथन है कि स्वाद शक्ति नस्ल लक्षण है। उनका कहना है आदिवासियों में स्वाद शक्ति के प्रबलता होती है पर गोरी जातियों में बहुत कम होती है। उन्होंने एक ऐसे आदमी का भी उदाहरण दिया, जिसकी किसी दुर्घटना में घ्राण शक्ति नष्ट हो गई थी, इस पर उसकी स्वाद शक्ति ने भी काम करना बन्द कर दिया था। बिना खाये केवल देखकर ही स्वाद और गंध लेने के भी उन्होंने 

प्रयोग करके बताये। यह सब बातें यह बताती हैं कि आत्मा अपनी-अपनी अलग-अलग स्थिति में भिन्नताएँ अनुभव करती हैं, वस्तुतः भिन्नता नाम की कोई वस्तु संसार में है ही नहीं सब एक तार में जुड़े माला में समान हैं।

जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अत्यन्त स्थूल हैं, इसलिये मोटी वस्तुएँ ही हमें दिखाई देती हैं और हम उन सूक्ष्म शक्तियों को परखने से वंचित रह जाते हैं, वस्तुतः जिससे यह सारा संसार बनता बिगड़ता है यही हमारा सबसे बड़ा अज्ञान, माया और भ्रम हैं, यदि हम अपना दृष्टिकोण व्यापक, विशाल और अत्यन्त सूक्ष्म बना पाये तो देखें कि सागर कितना सुन्दर, अभाव रहित, शाश्वत और अनश्वर हैं, परिवर्तनशील और नाशवान् तो यह दृश्य और स्थूल जगत् है उससे लिपटे और आसक्त होने के कारण ही संसार भ्रम में हैं, उस भ्रम का निवारण किये बिना मनुष्य जाति का कल्याण नहीं।







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