समकालीन उपन्यास साहित्य में नारी विमर्श

17 जून 2016   |  डाॅ कंचन पुरी   (5209 बार पढ़ा जा चुका है)

समकालीन उपन्यास साहित्य में नारी विमर्श

वैदिक काल में नारी की स्थिति अत्यन्त उच्च थी। उस काल में यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता की कहावत चरितार्थ होती थी। भारतीयों के सभी आदर्श रूप नारी में पाए जाते थे, जैसे सरस्वती(विद्या का आदर्श), लक्ष्मी(धन का आदर्श), दुर्गा(शक्ति का आदर्श), रति(सौन्दर्य का आदर्श) एवं गंगा(पवित्राता का आदर्श) आदि। उस समय नारी को चौंसठ कलाओं की शिक्षा दी जाती थी। पत्नी के रूप में वे पतिपरायणा थी। युद्धक्षेत्र में पति संग शस्त्र-संचालन भी करती थी। रथ की सारथी बनकर मार्गदर्शन भी करती थी। सार्वजनिक क्षेत्रों में स्त्रियां  शास्त्रार्थ भी करती थीं। उस काल में पुरुषों का वर्चस्व था, लेकिन नारी को भी सम्मान दिया जाता था। 

उत्तर वैदिक काल में कन्या का जन्म चिंता का विषय था और पुत्र प्राप्ति गर्व का। पुत्र रत्न न दे पाने के कारण उसका त्याग कर दिया जाता था। पति पुनर्विवाह कर सकता था। इस काल में विधवा स्त्रियों का जीवन अत्यन्त कठिन था। उनके लिए अत्यन्त कठिन नियम थे, जैसे एक समय भोजन करना, श्वेत वस्त्र धारण करना, सिर मुंडवाना आदि। इस काल में नारियों की दशा दयनीय थी। समाज में अनेक कुप्रथाएं फैल गयी थीं, जैसे सतीप्रथा, बालविवाह, परदा प्रथा, अनमेल विवाह आदि। वैदिक काल में नारी के दिव्य गुण धीरे-धीरे इस काल में उसके अवगुण बनने लगे थे। वैदिक युग में स्त्रियां धर्म एवं समाज का प्राण थीं। इस काल में वे हर क्षेत्र में वे अयोग्य घोषित की गईं। उनको विवाह संस्कार के अतिरिक्त सभी संस्कारों से वंचित कर दिया गया था। 

मध्यकाल में नारियों की स्थिति उत्तरोत्तर गिरती गई। अरबों तथा मुसलमानों के आक्रमणों के कारण उनकों सदैव सुरक्षित रखा गया। वे मात्र गृहिणी थी और गृहकार्य में लिप्त थीं। इसकाल के अन्त में नारियों की दयनीय स्थिति में बहुत परिवर्तन आया और उन्नीसवीं सदी के आसपास अनेक समाज सुधारक जैसे राजा राममोहन राय ने नारी पर होने वाले कई अत्याचारों को समाप्त कर उनकी शिक्षा की व्यवस्था की। सती प्रथा का विरोध किया। बंगाल के ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा के पुनर्विवाह के मार्ग खोल दिए। स्वतन्त्रता आन्दोलन में गांधी जी ने भी नारियों के अपनी योग्यता सिद्ध करने का निमन्त्रण दिया था। वर्तमान समय में तो कु.कल्पना चावला, श्रीमती सुनीता विलियम्स ने नए आविष्कार करके निज योग्यता सिद्ध की है। किरण बेदी, बरखा दत्त जैसी नारियां भी सफलता के ज्वलंत उदाहरण हैं। भूतपूर्व प्रधानमन्‍त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी शक्तिशाली महिला के रूप में स्मरणीय हैं। राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर श्रीमती प्रतिभा पाटिल अपनी दक्षता का परिचय दे रही है। समाज प्रतिपल विकास की ओर निरन्तर गतिमान है। इस परिवर्तनशील समाज में उपन्यासकारों की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में चहुं ओर तनावपूर्ण वातावरण है। दुराचार, अनाचार, भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर सुरसा के मुख सदृश विकराल रूप धारण कर चुका है। समकालीन उपन्यासकारों ने बाधाओं एवं संकटों की परवाह किए बिना अपनी रचनाओं के द्वारा समाज का वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने मुक्त-हस्त से निडर होकर अपनी कलम चलाई और नारी-विमर्श को लेकर कुछ-न-कुछ अवश्य लिखा। 

मोहनराकेश जी ने अन्तराल उपन्यास में सीमा के चरित्र में नवीन रूप प्रस्तुत किए हैं। वह धर्म का बन्धन नहीं मानती है, नशे का प्रयोग करती है और आत्मनिर्भर होने के कारण अभिमानी है। बड़ों का आदर नहीं करती है। अन्य स्‍त्री पात्र विधवा है और पुनर्विवाह करने में उसे कोई आपत्ति नहीं है। इसी उपन्यास में कुमार की पत्नी कान्ट्रक्ट मैरिज करती है और न निभने पर वापस लौट आती है। उपन्यासकार ने नारी के विविध रूपों को उजागर किया है। अन्य उपन्यास में अन्धेरे बंद कमरे में नारी के अप्रसन्न दाम्पत्य जीवन को उजागर किया है। इसमें नायक हरवंश आधुनिक पति है और वह चाहता है कि उसकी पत्नी नीलिमा मदिरा पिए, धूम्रपान करे तथा पराए पुरुषों से मुक्त व्यवहार रखे। वह बाद में विदेश चला जाता है और नीलिमा के बिना अकेलापन महसूस करता है। क्षमा मांगने पर नीलिमा उसकी ओर ध्यान नहीं देती है। वह भी एक नृत्य समूह के साथ विदेश चली जाती है। वहां एक विधुर पुरुष उबानु सम्पर्क में आता है और विवाह का प्रस्ताव रखता है तो वह अस्वीकार कर देती है। वह पत्रकार मधुसूदन से परिवर्तित जीवन मूल्यों की चर्चा करती है। वह सोचती है कि जीवन में ऐसा कोई मूल्य नहीं है जिस पर व्यक्ति अडिग रह सकता है। 

अज्ञेय जी ने नदी के दीप उपन्यास में रेखा के पात्रा द्वारा नारी के अहं का शालीन रूप प्रस्तुत किया है, जिसने अहं के बल से भावुकता को जीत लिया है, उसके चरित्र में अहं का सदरूप विद्यमान है। अन्य पात्रा गौरा के चरित्रा में अहं का संयत रूप परिलक्षित होता है। उपन्यासकार ने पुरुषप्रधान समाज में नारी के सबल व्यक्तित्व को प्रस्तुत कर सामाजिक परम्पराओं को खोखला सिद्ध कर दिया है।

श्री राजकमल चौधरी ने अपने उपन्यास मछली मरी हुई में नारियों की रुग्ण आसक्ति को उजागर किया है, जो नारियां पुरुषों सदृश जीवन व्यतीत करती है और माता बनने से कतराती है। ये नारियां समलैंगिकता की ओर अधिक झुकाव रखती हैं। यह उपन्यास समलैंगिक यौनाचार में लिप्त स्त्रियों को आधार बनाकर लिखा गया है। यह मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। उपन्यासकार की दृष्टि में यौन आवश्कता कोई अमंगल बात नहीं है, परन्तु विकृत कामभावना एक मानसिक रोग है। शारीरिक और मानसिक पतन इसका प्रतिफल है। सामाजिक समायोजन के लिए इससे दूर रहना ही उचित है। 

सूर्यकुमार जोशी जी ने अपने उपन्यास दिगंबरी में एक ऐसी नारी की कहानी को वर्णित किया है जो अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए विनय नामक पुरुष से विवाह कर लेती है और बेटी को जन्म देती है। इसमें अन्य नारी सदाशा अपरिपक्व अवस्था में अपनी सहेली मालिनी से यौन जीवन की समस्त बातें जान लेती है। उसकी मां वेश्या और पिता वेश्यागामी व शराबी थे। वह विनय के सम्पर्क में आकर संबंध स्थापित करती है और विनय से सम्बन्ध तोड़कर अन्य पुरुषों से सम्बन्ध जोड़ती है। उसे मातापिता से ऐसे संस्कार मिले जिससे वह स्वयं पतित हुई और सम्पर्क में आने वाले सभी पुरुषों को पतित किया।

प्रियवंदा ने अपने उपन्यास रुकोगी नहीं राधिका में आधुनिक परिवेश से उदिता नारी ही को विषय बनाया। प्रियवंदा जी का कहना है कि एक ऐसी स्‍त्री का, जो कि अपने में उलझ गई है और अपने को पाने की खोज में उसे अपने ही अन्दर बैठकर खोज करनी है। राधिका का निपट अकेलापन और भारत में अपने को उखड़ा-उखड़ा जीना मेरी अपनी अनुभूतियां थीं, जिन्हें कि मैं बेहद लाड़-प्यार के बावजूद नकार नहीं सकी। सो यह नारी के अकेले होने की स्थिति है। 

मन्नू भंडारी ने अपने उपन्यास आपका बंटी में आधुनिक नारी को घर की चार दीवारी से निकालकर कर्मक्षेत्र में ला-खड़ा किया है। शिक्षित युवती के वैवाहिक जीवन की आंतरिक त्रासदी की सूक्ष्म पहचान अंकित की है। तलाक-शुदा मां-बाप की सन्तान बंटी न माता का है और न पिता का है, आपका बंटी है अर्थात्‌ समाज का। उनकी दृष्टि में समाज की ज्वलन्त समस्या है तलाक। 

लोकप्रिय लेखिका कृष्णा सोबती ने मित्रों मरजानी, डार से बिछुड़ी, सूरजमुखी के अंधेरे के स्‍त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित बलात्कार की विभीषिका दर्शाते उपन्यास हैं। इसमें वर्षों से अंधेरे की परतों के नीचे ढंकी नारी को चित्रित किया गया है।

शशिप्रभा शास्‍त्री ने नारी मन की जटिल गुत्थियों को सुलझाने की प्रक्रिया अपने उपन्यासों में की है। उनके उपन्यास नावें में विवाह पूर्व किसी नारी के मां बनने और उससे उत्पन्न विसंगत परिस्थितियों में सही जीवन की तलाश की संघर्ष गाथा है। उनके अनुसार नारी को अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलन्द करते देखती हूँ तो सन्तोष होता है।

ममता कालिया जी ने अपने उपन्यास बेघर और नरक दर नरक में नारी के प्रति समाज का क्या दृष्टिकोण है, इसको अभिव्यक्ति दी है। पुरुष ने नारी को उपभोक्तावादी वस्तु समझ लिया है। 

इस प्रकार उपन्यास साहित्य में नारी विमर्श की चर्चा यत्र-तत्र की गई है। नारी अबला थी, पर अब नहीं है। अब उसे  निज शक्तियों को विकसित करने का सुअवसर प्राप्त है। आज नारी कहीं भी रहती हो, ग्राम में हो या शहर में, वह कर्तव्यनिष्ठ है, संघर्षशील है, संवेदनशील है, उसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है। वे जीवन की अति व्यस्तता में भी निज कर्तव्य को विस्मरण नहीं करती हैं। अब नारी विमर्श अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है, उसकी अपनी एक पहचान है। अब नारी हर क्षेत्र में कर्मरत है, उसने समस्त सीमाओं को लांघकर अपने बलबूते स्वयं की एक विश्वस्तरीय पहचान बना ली है। अब नारी विमर्श अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी न होकर तुम शक्ति संग संसार-रथ की सारथी हो है। 


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