कविता कुछ ऐसा भी होगा - राम लखारा 'विपुल'

18 जून 2016   |  राम लखारा   (252 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप, आंधी, विष और पीड़ा सारे तू सह ले 

कुछ ऐसा भी होगा जो कि कभी हुआ न पहले 


पथ में बाधा लाख मिलेगी चलने वाले को 

रेत, पत्थर, बांध, चढाई और कई ढलाने 

रूके बिना ही थके बिना जो राहो पर बढे 

निश्चित होंगे एक दिन वो सागर के मुहाने 


जिस मस्ती में बहे नदी उस मस्ती में बह ले 

कुछ ऐसा भी होगा जो कि कभी हुआ न पहले


पथ में ऐसे पथिक मिलेंगे जाने अनजाने 

जिनके मुख पर प्रेम हृदय में विष प्याले होगें 

ऐसे होंगे जीवन जल में मौन तपस्वी जो 

उजले उजले कपड़ो में मन के काले होंगे 


मणि सांप के निकट ज्यो रहती वैसे तू रहले 

कुछ ऐसा भी होगा जो कि कभी हुआ न पहले


मिलते कांटे राहों में, होतेे नहीं घरों में 

मंजिल के राही को इनसे एक दिन लड़ना है 

उत्तरों की जिज्ञासा में नचिकेता के भांति 

हर किसी को नील गगन का सफर तय करना है 


काल की हर चाल पर मारों नहले पे दहले

कुछ ऐसा भी होगा जो कि कभी हुआ न पहले 


कवि  - राम लखारा 'विपुल' 


अगला लेख: क्या हमें एक दूसरे की रचनाओं पर टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए?



कुछ ऐसा भी होगा जो कि कभी हुआ न पहले ....यथार्थ को प्रस्तुत करती एक कड़वी सच्चाई. ....आपकी लेखनी को नमन ....बहुत उम्दा सृजन ..

राम लखारा
16 अक्तूबर 2016

थैंक्स दी

वा वा वा वास्तविकता यही हैं

जी शुक्रिया . जीवन में भी यही होता है

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