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मिलावटी होते इन्सान

20 जून 2016   |  चन्द्र प्रभा सूद

मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है।
हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन्दगी जी रहे हैं। हम सहज और सरल नहीं बन पा रहे हैं। हमारी कथनी, करनी और सोच में बहुत अन्तर है। हम जो सोचते हैं उसे व्यवहार में नहीं लाते और न ही मन में सोचे भावों को अपनी वाणी से यथावत प्रकट करते हैं।
आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में किसी के पास दो पल का समय नहीं है कि दो मिनट रुककर थकने वाले को सान्त्वना दे सके। जो रेस में पीछे छूट जाता है अथवा गिर जाता है, हम उसकी ओर हाथ बढ़ाकर उसे नहीं उठाते। बस उसे हालात से लड़ने के लिए यूँही छोड़ देते हैं।
अपने स्वार्थो को सर्वोपरि समझने वाले लोग गधे को भी बाप बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अद्ययुगीन मनुष्य की यही विडम्बना है कि वह पैसे को महत्त्व देता है। सभी सम्बन्ध उसके स्वार्थ के सामने बौने हो जाते हैं क्योंकि वह उन्हें पैसे की कसौटी पर ही तौलता है। वह इस सत्य को भूल जाना चाहता है कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं होती। आज वह उसके पास है तो कल उसे छोड़कर किसी दूसरे का वरण कर लेगी। उस पर मान करके दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मानना सर्वथा अनुचित है। ईश्वर न करे ऐसी विपन्नावस्था आ जाने पर अपनी स्थिति के विषय में विचार करते हुए अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखें।
हमारी सोच और हमारा व्यवहार दोनों परस्पर मेल नहीं खाते। जिन लोगों को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं, पानी पी-पीकर कोसते हैं, जब वे प्रत्यक्ष सामने उपस्थित हो जाते हैं तो उनकी मनुहार करते हैं। तब उन्हें यह अहसास कराते हैं कि उनके सबसे प्रिय वही हैं।
इस मानसिकता के चलते अपने सगे रिश्तों के साथ भी ऐसा कृत्रिम व्यवहार करने को भी हम बुरा नहीं मानते। इसलिए 'मुँह में राम बगल में छुरी' वाली उक्ति कही गई है।
मन में प्रेम नहीं परन्तु उसका जी जान से प्रदर्शन करते हैं। धन का अभाव होने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो सारी दुनिया को खरीद सकते हैं। अल्प ज्ञान होने पर भी सबके हृदयों में विद्वत्ता की ऐसी धाक जमाना चाहते हैं कि सब हमारा लौहा मानने लगें।
असामाजिक कार्य यानि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरबाजारी आदि करते हुए भी स्वय को शुद्ध व पवित्र आत्मा होने का दावा करते हैं। अधार्मिक कृत्य करते हुए सबसे बड़े धार्मिक होने का प्रपंच करते हैं। बात-बात पर झूठ बोलने वाले कसमें खाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देने का यत्न करते हैं।
माता-पिता बच्चों के समक्ष और बच्चे माता-पिता के सामने मुखौटों में रहते हैं। भाई-बन्धुओं के साथ भी बस पाक-साफ बनने का ढोंग किया जाता है।
राजनेता तो जनता के बीच जाकर अपनी नाकाम उपलब्धियों का बखान करते नहीं अघाते। वे ऐसा जाल फैंकने का प्रयास करते हैं कि हर कोई उनके वश में हो जाएँ।
कोई भी यह समझने-बूझने के लिए तैयार नहीं होता कि 'काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।' इसी तरह जब मुखौटा चेहरे से उतर जाता है तब वह विकृत चेहरा बहुत ही भयावह दिखाई देता है।
मनुष्य का चेहरा एक आईना होता है, जिसमें उसके मन के सभी भाव दूसरों को सरलता से दिख जाते हैं। ईश्वर को भी किसी तरह का दिखावा पसन्द नहीं है। अतः अपने मुखौटानुमा मिलावटी आचरण को छोड़कर स्वभाविक रूप मे रहना चाहिए। इसी में मनुष्य का बड़प्पन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
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