दया धर्म का मूल है

20 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (1857 बार पढ़ा जा चुका है)

 हमारा देश भारत धर्म निरपेक्ष देश होते हुए भी ऐसा धर्म प्रधान देश है कि धर्म के बिना भारत कैसा होगा इसकी

कल्पना भी करना कठिन है. धर्म का वैचारिक अर्थ है जिसे धारण किया जाये या फिर वह कर्तव्य जिसे पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया जाये, कबीर दास जी ने भी अपने एक दोहे में कहा है " दया धर्म का मूल है" 

लेकिन यहां तो जन समुदाय में धर्म के नाम पर चिंगारी हमेशा सुलगती रहती है जिसे जो चाहे जब चाहे थोड़ी सी हवा 

देकर एक अग्नि कांड में परिवर्तित कर सकता है. कई लड़ायी झगड़ो के पीछे किसी न किसी का कोई न कोई धर्म अवश्य रहा है. कुछ लोगों ने अपने धर्म को संपूर्ण संसार में फैलना ही अपना धर्म समझा, और जो भी लोग इसमें बाधक बने उन्हें गाजर मूली की तरह काट दिया गया. क्रूरता यहां तक भी बढ़ी कि कुछ लोगों ने दूसरे धर्म के हर निशान को मिटाना चाहा. ग्रंथों और पोथियों को भी जला डाला इससे भी अधिक खेद की बात यह है इतना कुछ करने के बाद भी ये लोग धर्म 

के सच्चे अनुयायी कहलाते रहे. एक विचारक ने कहा है "लोग धर्म के लिये सोचेंगे, लिखेंगे, लड़ेंगे और मरेंगे लेकिन जीयेंगे नही", जबकि धर्म हमें जीना सिखाता , दया भाव सिखाता है और सबसे बड़ी बात धर्म हमें भाईचारा सिखाता है.

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