योग जीवन का आधार है

21 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (1669 बार पढ़ा जा चुका है)

योग भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण  वीध्या है. योग से हमारा सर्वांगीण, शरीरिक, मानसिक, बौद्धिक, व्यवहारिक विकास होता है. योग जीवन जीने की कला है, जिसे सीखकर व्यक्ति स्वस्थ रहता है, जीवन में सफल होता है. जीवन दिव्य बनाता है और अपना भाग्य बदलने में सक्षम होता है. योग सर्वांगीण विकास करने वाली कला है, इससे चरित्र में सुधार, चेहरे पर तेज़, वाणी में मधुरता, कार्य में कुशलता, रोगों से मुक्ति, तनाव रहित और प्रसन्नता पूर्ण जीवन जीया जा सकता है. योग के द्वारा पारिवारिक जीवन में बेहतर तालमेल किया जा सकता है, बुरी आदतों को योग के द्वारा छोड़ा जा सकता है. योग नकारात्मक विचारों से सकारात्मक विचार बनाता है जिससे हम निराशा, हताशा, अवसाद और कुंठा से बच सके और आशा और उत्साहपूर्वक जीवन जी सकें.<br>

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समाधानाय सौख्याय निरोगत्वाय जीवने।
योगमेवाभ्यसेत प्राज्ञ: यथाशक्ति निरंतरम्।।
(परम पूज्य जनार्दन स्वामी )
जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल, नागपुर
सादर समर्पित
योगाभ्यासी अरविंद लोंढे (योगारविंद ) -9423073496

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चाहे भोजन करने के लिए कुर्सियों का जंग हो या नेताओं के बीच सत्ता का लेकिन कुर्सी का खेल बड़ा ही निराला है कोई मेज के लिए झगड़ा क्यों नहीं करते क्या खास बात है कुर्सी में इसे तो ऐसे ही समझ लेना चाहिए कि आज से ही मोदी क्यों इलाहाबाद जाकर अपनी कुर्सी पक्का करने में जुट गयें हैं |ये दूसरो को बेकार और अप
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😂झूठ बोलना …बच्चों के लिए … पाप ,,कुंवारों के लिए …. अनिवार्य ,,प्रेमियों के लिए ….. कला ,,और …शादीशुदा लोगों के लिए … शान्ति से जीने का मार्ग होता है....!!""✋ये है इस हफ्ते का साप्ताहिक ज्ञान।बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ कर निकाला है।गीता में लिखना रह गया था।
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श्याम जी को अपने मकान के लिए कई दिनों से किरायेदार की तलाश थी.  मेरे एक मित्र का ट्रांसफर मेरे ही शहर में हो गया. उसने रहने के लिए मुझसे किराये का कमरा दिलवाने को कहा. मैं और मेरा मित्र श्याम जी का कमरा देखने चले गए. कमरा मित्र कोपसंद भी आ गया, लेकिन श्याम जी को जैसे ही पता लगा मेरा मित्र दूसरे धर्म
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 हमारा देश भारत धर्म निरपेक्ष देश होते हुए भी ऐसा धर्म प्रधान देश है कि धर्म के बिना भारत कैसा होगा इसकी कल्पना भी करना कठिन है. धर्म का वैचारिक अर्थ है जिसे धारण किया जाये या फिर वह कर्तव्य जिसे पूर्ण निष्ठा के साथ निभाया जाये, कबीर दास जी ने भी अपने एक दोहे में कहा है " दया धर्म का मूल है" लेकिन 
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जिस देश में बेटियां बिकने पर मजबूर हों और बेटे घर परिवार की सुरक्षा के लिए कलम की बजाय बंदूक पकड़ने को मजबूर हो जाएँ, तो ऐसी आजादी बेमानी होने की बात मन में उठना स्वभाविक है. बाजार हो या ट्रेन, या बस हो, कब छुपाकर रखा बम फट जाये, इस दहशत में आजाद भारत में जीना पड़े तो इसे विडंबना ही कहा जायेगा. जहाँ ए
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