सन्तुलन

23 जून 2016   |  दुर्गेश नन्दन भारतीय   (96 बार पढ़ा जा चुका है)

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न बढा नजदीकियाँ इतनी,कि वे दूरियों का आधार बन जाएँ |

कस न तू वीणा के तार इतने,कि वे उसके टूटे तार बन जाएँ ||

सन्तुलन ही है जिन्दगी , बच अतियों से ओ भोले इन्सान ,

मनाएँ अगर तू सलीके से , तो रूठा तेरा हर यार मन जाए ||
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