उपहार

23 जून 2016   |  सुमन शर्मा   (103 बार पढ़ा जा चुका है)

समझो मेरे नैनों की मौन भाषा समझो मेरा सच्चा प्रेम दे रही हूँ सर्वस्व अपना उपहार में तुम्हें। सारे वृक्षों के फूल और कलियाँ सारी भौरें की गुंजन और तितलियां प्यारी मध्यान्ह के चमकते सूर्य की गर्मी और जंगल की हरी छाया दे रही हूँ सर्वस्व अपना उपहार में तुम्हें। अनन्त नीला आकाश उसमें उड़ते हुए बादल सारे खेतों की हरियाली और अपना उषाकाल भावशून्य रातों का संगीतमय स्वर और वर्षा का लयबद्ध बहाव दे रही हूँ सर्वस्व अपना उपहार में तुम्हें। चिड़ियों का चहकना पक्षियों का उड़ना चंद्रमा का चमकना और दिन का निकलना अपना जीवन सारा और अपना समयचक्र बस तुम खुश रहो दे रही हूँ सर्वस्व अपना उपहार में तुम्हें।। -सुमन शर्मा 

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