प्रेम

24 जून 2016   |  प्रिंस सिंघल   (135 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेम किसी के लिये ज़िम्मेदारी है तो किसी के लिये वफादारी. किसी के लिये प्रेम लालसा है तो किसी की वासना, कोई अपनी सुविधा देखकर प्रेम करता है तो कोई आपसी योग्यता को देखकर. प्रेम की गहराई नापना असंभव है. लोग किसी महिला और पुरुष के संबंध को प्रेम मानते है, तो क्या एक माँ का अपने पुत्र या पुत्री के प्रति प्रेम नही है, लेकिन क्या प्रेम सिर्फ़ सजीव से ही हो सकता है प्रेम तो किसी निर्जीव वस्तु से भी तो हो सकता है तो क्या ये प्रेम 

नही है. इन सबसे ये तो निष्कर्ष निकलता है की प्रेम करने के लिये कीन्ही दो का होना तो अनिवार्य है. और शुद्धता से किया गया प्रेम वो है जिसमे दोनों दो ना रह कर एक हो जाये, प्रेम जोड़ता है, प्रेम त्याग है, प्रेम तपस्या है. प्रेम वह सुगंध है जिसकी महक प्रेमी में हमेशा के लिये बस जाती है 

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रेणु
18 मार्च 2017

बहुत प्रेरक विचार है प्रिन्स आपको बहुत शुभकामना --

बहुत बहुत धन्यवाद रेणु जी

अति रमणीक

सुन्दर सोच

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