नारी

25 जून 2016   |  सुमन शर्मा   (410 बार पढ़ा जा चुका है)


नारी "-ईश्वर की सर्वश्रेष्ठतम कृति ================== ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग, पग-तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में।' वास्तव में नारी इन पक्तियों को चारितार्थ करती है।नारी श्रद्धा,प्रेम,समर्पण और सौंदर्य का पर्याय है। नारी अमृत तुल्य है क्योंकि वह जीवन देती है,जीवनदात्री है। सृष्टि रचयिता ब्रह्मा के बाद सृष्टि रचना में अगर किसी का योगदान है तो वो नारी का है।अपने जीवन को दांव पर लगाकर एक जीव को जन्म देने का साहस ईश्वर ने केवल नारी को प्रदान किया है।नारी धरा की भांति धैर्यवान है तो दुर्गा की तरह शक्ति स्वरूपा भी। नारी सौंदर्य संसार की सबसे प्रभावोत्पादिनी शक्ति है।एक ओर जहाँ नारी सौंदर्य मूर्ति है तो दूसरी ओर काली का रूप भी। नारी के अनगिनत रूप हैंै। वह मां, बेटी, बहन, पुत्री, प्रेमिका, पत्नी सभी रूपों में पुरुष का संबल है। मनुष्य के जीवन में यदि कोई उसकी प्रथम शिक्षिका, पथ प्रदर्शिका, शुभचिन्तक है तो वह माँ है।नारी के माँ स्वरुप में ईश्वर स्वयं इस धरा पर विद्यमान है। ईश्वर के उपरांत ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट रचना यदि कोई है तो वो नारी ही है। नारी ईश्वर की अनुपम कृति है। आदिकाल से लेकर आज तक का भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि नारी किस प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष की अभिन्न सहयोगिनी के रूप में अपने नारीत्व को दीपित करती आयी है। नारी के सहयोग के अभाव में पुरुष ने सदा एकाकीपन अनुभव किया है और जहाँ भी सहयोगिनी के रूप में नारी प्राप्त हुई है वहाँ उसने अभिनव से अभिनव सृष्टि की रचना की है। वेद-शास्त्रों में कहा गया है- 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जहाँ नारी का सम्मान किया जाता है,वहीँ देवता निवास करते हैं।नारी के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना असम्भव है। 'करूं कल्पना इस दुनिया की तुम बिन जब-जब हे नारी लगती है इक उजड़ी बस्ती मुझको तो दुनिया सारी बिन फूलों के जैसे उपवन बिन सावन के जैसे मधुबन पर तेरा जीवन एक तपोवन जिसमे है अर्पण ही अर्पण।' 

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नारी के रूप बहुआयामी होने के कारण ही महान है

धन्यवाद

बहु सुंदर

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